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Gwalior High Court: ‘सिर्फ वरमाला पहनाने से हिन्दू विवाह वैध नहीं, 7 फेरे जरूरी…’

Hindu Marriage: सात फेरे बिना हिंदू विवाह मान्य नहीं, नोटरी को विवाह-तलाक दस्तावेज बनाने का अधिकार नहीं। कोर्ट ने कहा कि केवल वरमाला पहनाने से विवाह वैध नहीं माना जा सकता।
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Gwalior High Court order: किराएदार की अपील खारिज (Photo Source- freepik)

Gwalior High Court Bench: ग्वालियर हाइकोर्ट का आदेश (Photo Source - Patrika)

Gwalior High Court Bench: एमपी में ग्वालियर हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि सप्तपदी (सात फेरे) के बिना हिन्दू विवाह वैध नहीं माना जा सकता। नोटरी को विवाह या तलाक से जुड़े दस्तावेज तैयार करने का कोई अधिकार नहीं। इसी के साथ कोर्ट ने दतिया के नोटरी राघवेंद्र समाधिया का लाइसेंस तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर कारण बताओ नोटिस जारी किया है। जस्टिस जीएस अहलूवालिया व अनुराधा शुक्ला की युगलपीठ ने कहा, विधि मंत्रालय ने 10 अक्टूबर 2024 को नोटरी का विवाह/तलाक के दस्तावेज बनाना प्रतिबंधित किया है। फिर भी नोटरी ने 'विवाह व पंजीयन लिखतम' बनाया। यह गंभीर कदाचार है।

ये है पूरा मामला

आगे इस मामले में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में चंद्रपाल परिहार ने दावा किया था, पत्नी को ससुरालवालों ने बंधक बनाया है। कोर्ट में युवती ने कोर्ट को बताया, आरोपी दोस्त था। शादी का दबाव बना रहा था। शादी न करने पर फोटो वायरल करने की धमकी दी। डर से उसके साथ दतिया कोर्ट गई। वकील ने दस्तावेज-रजिस्टर पर साइन कराए।

परिसर के बाहर सिर्फ वरमाला पहनाई गई थी। कोर्ट ने कहा-वरमाला पहनाने से हिन्दू विवाह वैध नहीं होता। कोर्ट ने युवती के माता-पिता से पूछा, क्या वे बेटी को अपनाने और पढ़ाई जारी रखने को तैयार हैं। माता-पिता ने सहमति दी तो कोर्ट ने युवती को सुपुर्द करने के निर्देश दिए। अब 28 जुलाई को नोटरी को मूल रजिस्टर प्रस्तुत करना होगा।

13 साल पहले निकाह, फिर दहेज प्रताड़ना

एक अन्य मामले में ग्वालियर हाईकोर्ट की सिंगल बैच ने एक फैसले में मृतका के मायके पक्ष द्वारा ससुराल पक्ष के तीन अन्य सदस्यों को अतिरिक्त आरोपी के रूप में शामिल करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के तहत किसी को अतिरिक्त आरोपी बनाने की शक्ति एक असाधारण और विवेकाधीन शक्ति है, जिसका उपयोग बेहद सतर्कता और पुख्ता सबूत होने पर ही किया जाना चाहिए। केवल गवाहों के बयानों में नाम आ जाने मात्र से किसी को आरोपी नहीं बनाया जा सकता है।

जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की बैच ने याचिकाकर्ता शब्बीर खान द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका की सुनवाई करते हुए पारित किया। याचिकाकर्ता शब्बीर खान की बेटी फौजिया का विवाह 12 अप्रैल 2013 को मुजीब खान के साथ मुस्लिम रीति-रिवाज से हुआ था। शादी के बाद से ही ससुराल वालों द्वारा दहेज की मांग को लेकर मृतका को शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाने लगा था।