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फांसी की सजा की रद्द, ​ग्वालियर कोर्ट का बड़ा फैसला, पीठ पीछे दर्ज गवाही की खारिज

Gwalior Court Overturns Death Sentence- मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने फांसी की सजा निरस्त कर निचली अदालत को लौटाया मामला
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Gwalior Court overturns death sentence in a major ruling

Gwalior High Court: हाइकोर्ट का फैसला (Photo Source- freepik)

Gwalior High Court - मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने फांसी की सजा रद्द कर दी है। हाईकोर्ट की ग्वालियर बैंच ने यह फैसला सुनाया। दुष्कर्म व हत्या मामले में निचली अदालत ने आरोपी को दोषी पाते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने मामले में धारा 273 के उल्लंघन पर आपत्ति जताई। आरोपी के पीठ पीछे दर्ज गवाही हुई थी जिसे ग्वालियर ​हाईकोर्ट ने सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए मामला दोबारा निचली अदालत को सौंप दिया है। इसके साथ ही दुष्कर्म व हत्या मामले में फैसला सुनाने के लिए निचली अदालत के लिए समय सीमा भी तय कर दी है।

बेहद गंभीर आपराधिक केस में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ का यह फैसला बेहद अहम बताया जा रहा है। हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि आरोपी की अनुपस्थिति में दर्ज किए गए बयान की कोई कानूनी वैधता नहीं मानी जा सकती है।

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ ने मुरैना के एक बेहद संवेदनशील मामले में यह बड़ा आदेश दिया है। मामला नाबालिग से दुष्कर्म और हत्या का था। निचली अदालत ने आरोपी को दोषी करार दिया और फांसी की सजा सुनाई। इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

ग्वालियर हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा दोषी को सुनाई गई फांसी की सजा को रद्द कर दिया। निचली कोर्ट का यह आदेश
तकनीकी और प्रक्रियात्मक खामी के चलते निरस्त किया गया है। हाईकोर्ट ने पाया कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान तीन महत्वपूर्ण गवाहों के बयान आरोपी की अनुपस्थिति में दर्ज किए गए थे, जोकि कानूनन गलत है।

कोर्ट को 19 अगस्त तक नया फैसला सुनाना होगा

ग्वालियर हाईकोर्ट ने नाबालिग से दुष्कर्म और हत्या के इस मामले में निर्णय देने के लिए निचली अदालत के लिए समय सीमा भी निर्धारित कर दी है। हाईकोर्ट ने 20 जुलाई तक गवाहों के दोबारा बयान लेने का कहा है। इसके साथ ही निचली अदालत के लिए ​डेडलाइन तय करते हुए कहा कि कोर्ट को 19 अगस्त तक नया फैसला सुनाना होगा।

'फांसी' (Hanging) केवल 'दुर्लभ से दुर्लभतम' (Rarest of rare) मामलों में ही

गौरतलब है कि देश में 'फांसी' (Hanging) की सज़ा केवल 'दुर्लभ से दुर्लभतम' (Rarest of rare) मामलों में ही दी जाती है। भारत में फांसी को मौत की सज़ा देने का सबसे प्रमुख और वैधानिक तरीका माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट की राय भी इसपर स्पष्ट है। देश की कोर्ट ने गले में फंदा डालकर फांसी देने के तरीके को संवैधानिक रूप से वैध माना है।

भारतीय दंड संहिता (IPC) और नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 393(5) के तहत मृत्युदंड की सजा प्राप्त व्यक्ति को "गर्दन में तब तक लटकाया जाता है जब तक कि उसकी मृत्यु न हो जाए।"