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धोखाधड़ी मामले में फंसे अफसर को राहत नहीं, ग्वालियर हाईकोर्ट ने सरकार को लगाई कड़ी फटकार

Gwalior High Court- दो विभागीय चार्जशीट को चुनौती देती याचिका पर कोर्ट सख्त, डबल जिओपार्डी का भी दिया जवाब

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प्रतीकात्मक फोटो

Gwalior High Court - एमपी में धोखाधड़ी मामले में फंसे एक अफसर को हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली है। पशुपालन विभाग के एक अधिकारी ने कार्रवाई को रोकने की मांग करते हुए याचिका लगाई पर ग्वालियर हाईकोर्ट ने इससे स्पष्ट इंकार कर दिया। इतना ही नहीं, कोर्ट ने मामले में सरकार को कड़ी फटकार भी लगाई। हाईकोर्ट के जस्टिस आशीष श्रोती ने कड़ी टिप्पणी करते हुए सरकारी विभागों को सुस्त और निष्क्रिय बताया। हाईकोर्ट ने कहा कि यह मामला ऐसा है जहां न केवल सरकारी पैसा दांव पर है बल्कि दोषी कर्मचारी की ईमानदारी और निष्ठा की भी जांच करने की जरूरत है।

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ के जस्टिस आशीष श्रोती ने पशुपालन विभाग के एक अधिकारी की याचिका पर सुनवाई की जिसमें धोखाधड़ी के आरोपों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई को रोकने की मांग की गई थी। कोर्ट ने जाली दस्तावेजों के माध्यम से धोखाधड़ी के आरोपों का सामना कर रहे अधिकारी को राहत देने से इनकार कर दिया। जस्टिस आशीष श्रोती ने दोषी अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्यवाही में देरी के लिए सरकारी विभागों को उनके “सुस्त रवैये” और “निष्क्रियता” के लिए फटकार भी लगाई। जस्टिस आशीष श्रोती ने कहा कि सरकारी विभागों में कार्यवाही में देरी अक्सर दोषी कर्मचारी द्वारा डाले गए प्रभाव के कारण होती है।

पशुपालन और डेयरी विभाग के सहायक पशु चिकित्सा क्षेत्र अधिकारी द्वारा हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई। उन्होंने कोर्ट से अपने खिलाफ आरोपों के संबंध में सरकार को कार्रवाई करने से रोकने के निर्देश देने की मांग की थी।

याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस आशीष श्रोती ने सरकारी रवैए पर सख्ती दिखाई। उन्होंने अपने आदेश में कहा “यह आम जानकारी है कि सरकारी विभागों में विभिन्न कारणों से कार्यवाही में देरी होती है। अधिकांश समय यह जिम्मेदार अधिकारियों की सुस्त रवैये और निष्क्रियता के कारण होता है। कई बार यह दोषी द्वारा डाले गए प्रभाव के कारण होता है। ऐसी देरी के कारण व्यक्तिगत रूप से किसी को कुछ भी नुकसान नहीं होता है। हालांकि अंततः यह सरकारी पैसा और सार्वजनिक हित है जिसे ध्यान में रखा जाना चाहिए।”

दो विभागीय चार्जशीट को कोर्ट में चुनौती

याचिकाकर्ता अधिकारी शर्मा पर जाली और मनगढ़ंत मेडिकल बिल जमा करके अपने और अपनी पत्नी के लिए धोखाधड़ी से मेडिकल प्रतिपूर्ति का दावा करने का आरोप लगाया गया था। इस केस में पशुपालन विभाग द्वारा 2019 और 2024 में जारी दो विभागीय चार्जशीट को उन्होंने कोर्ट में चुनौती दी। याचिकाकर्ता ने चार्जशीट को मुख्य रूप से बहुत ज़्यादा देरी और कथित डबल जिओपार्डी के आधार पर "अवैध और मनमाना" बताया।

कोर्ट ने यह देखते हुए कि याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप गंभीर थे और दस्तावेजी सबूतों" द्वारा समर्थित थे, अदालत ने कुल 9.64 लाख रुपए का कथित गबन पाया। हाईकोर्ट ने अपने 24 दिसंबर 2025 के आदेश में रिट याचिका खारिज कर दी और कहा कि अधिकारी 2024 की चार्जशीट के साथ आगे बढ़ने के लिए स्वतंत्र हैं। यह निर्देश भी दिया कि अनुशासनात्मक कार्यवाही शीघ्र और बिना किसी और देरी के पूरी की जाए।

जस्टिस श्रोती ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामले हो सकते हैं जिनमें छोटे या मामूली आरोप शामिल हों, जहां लंबे समय बाद जांच शुरू करना उचित नहीं हो सकता है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि ऐसा तर्क वहां लागू नहीं हो सकता जहां आरोप "गंभीर प्रकृति" के हों।

हाईकोर्ट ने इस केस को ऐसा मामला बताया जहां न केवल जनता का पैसा दांव पर है, बल्कि दोषी की ईमानदारी और निष्ठा की भी जांच की जानी है। अदालत ने कहा कि देरी के आधार पर चार्जशीट को रद्द करने का फैसला करते समय सभी पहलुओं पर विचार करने की आवश्यकता है।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा "इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में, यह स्वच्छ और ईमानदार प्रशासन के हित में नहीं होगा कि चार्जशीट को इस स्तर पर केवल देरी के आधार पर रद्द कर दिया जाए।

'डबल जिओपार्डी'

चार्जशीट को रद्द करने के लिए डबल जिओपार्डी के आधार पर जवाब देते हुए कोर्ट ने बताया कि यह सिद्धांत भारत के संविधान के अनुच्छेद 20(2) के तहत लागू होता है। याचिकाकर्ता के वकील की इस दलील में कोई दम नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 20(2) कहता है कि "किसी भी व्यक्ति पर एक ही अपराध के लिए एक से ज़्यादा बार मुकदमा नहीं चलाया जाएगा और न ही सज़ा दी जाएगी।"

हाईकोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 20(2) के तहत जो मना है, वह एक ही अपराध के लिए कई बार मुकदमा चलाना या सज़ा देना है। यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता पर अभी तक कोई सज़ा नहीं लगाई गई है और न ही कोई जांच हुई है।