
ग्वालियर सांसद शेजवलकर बोले- सिंधिया पर निर्भर नहीं थी भाजपा
नितिन त्रिपाठी, ग्वालियर. भाजपा के वरिष्ठ नेता और ग्वालियर सांसद विवेक नारायण शेजवलकर का कहना है कि भाजपा ग्वालियर चंबल इलाके में सिंधिया पर निर्भर नहीं थी। उन्होंने कहा कि इस अंचल में खेमेबाजी और कार्यकर्ताओं की नाराजगी जैसी बातों को नहीं मानता। पहले भी हम सिंधिया पर निर्भर नहीं थे। तब भी भाजपा जीतती थी। उनके भाजपा में आने से कांग्रेस कमजोर हुई है। बिना किसी का नाम लिए शेजवलकर ने यह भी कहा, अब नेता घर बैठकर ग्लैमर के सहारे नहीं जीत पाएंगे।
सांसद विवेक नारायण शेजवलकर से विधानसभा चुनाव, राजनीतिक परिदृश्य और भाजपा में गुटबाजी को लेकर पत्रिका ने बात की। इस बेहद खास बातचीत में उन्होंने साफगोई से जवाब दिए। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश...
ग्वालियर-चंबल में क्या आसान होगा अन्य दलों को पैर जमाना?
2018 का विधानसभा चुनाव छोड़ दें तो यह भाजपा का गढ़ रहा है। पिछली बार सरकार नहीं बना पाए, इसलिए सभी दलों को संभावना नजर आती है। जन कल्याणकारी योजनाएं और मजबूत संगठन के सहारे भाजपा चुनाव में आगे रहेगी।
निकाय चुनाव में मुरैना, ग्वालियर की हार भाजपा के लिए खतरे की घंटी है?
हां, हार खतरे की घंटी मान सकते हैं, लेकिन गुटबाजी या कार्यकर्ताओं की नाराजगी बड़ा कारण नहीं है। कुछ तो एंटी इंकम्बेंसी थी, इसलिए अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाए।
संगठन-सत्ता का चेहरा बदलने की बात आ रही है, क्या आप जैसे वरिष्ठों का सुझाव होता है?
अनेक स्तर पर बात कर निर्णय होते हैं। सभी की सलाह ली जाती है। विशेष मुद्दे पर बातचीत को बताना मुश्किल है। लेकिन, जो निर्णय होते हैं वो सर्वसम्मति से होते हैं। सूबे में भ्रष्टाचार का कोई मुद्दा नहीं होगा, क्योंकि सरकार पर कोई बड़ा आरोप नहीं है। ऑनलाइन सिस्टम से काफी हद तक भ्रष्टाचार कम हुआ है।
संगठन में गुटबाजी, अंसतोष सामने आ रहा है, क्या चुनाव में नुकसान होगा?
बात तो केवल यह होती है कि टिकट चाहते हैं। आज की राजनीति में चुनाव लडऩे की इच्छा रखना और दावेदारी करने में पार्टी को भी आपत्ति नहीं होती। सिंधिया के साथ कई लोग आए। इससे एसपायरेंट भाजपा में बढ़ गए। चयन के लिए चेहरे बढ़ गए। जिसकी छवि अच्छी हो, जीतने वाला हो, उसका चयन होगा।
रोप वे का प्रस्ताव डंप हो गया, चंबल के पानी को लाने पर आपकी नहीं सुनी गई?
रोप-वे जैसे विषय पर सरकार प्रयास करे, मैं फिर कोशिश करूंगा। चंबल परियोजना पर मैंने आपत्ति नहीं की थी, सुझाव दिया था। अब जो पानी मिलेगा, उतना तो ले ही लेना चाहिए। मेरे ध्यान में आई और मैंने मांग की है और वही मांग कोई और करता है तो इसमें बुराई नहीं है।
लगातार घोषणाएं, लंबित मांगों की पूर्ति और लाभ की योजनाएं लाने के पीछे डर क्या है?
जब योजनाएं महिला या किसी वर्ग के लिए हों तो उनका महत्व होता है। योजनाएं सतत बनती हैं। चुनाव के लिए करने की बात सही नहीं। योजनाओं का चुनाव में फायदा मिलता है तो अच्छी बात है।
Published on:
12 Jul 2023 09:33 am
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