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‘प्रशासनिक कार्यप्रणाली’ के लिए हाइकोर्ट का बड़ा आदेश पारित, दिए गए निर्देश

MP News: प्रभावित व्यक्ति को यह जानने का अधिकार है कि उसके पक्ष या बचाव को किस आधार पर खारिज किया गया। तर्कपूर्ण निर्णय ही न्याय वितरण प्रणाली में वादियों का विश्वास बनाए रखते हैं।

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High Court Major Order

High Court Major Order (Photo Source- freepik)

MP News: हाईकोर्ट की एकल पीठ ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर एक बड़ा आदेश पारित किया है। जस्टिस आनंद सिंह बहरावत की एकल पीठ ने स्पष्ट किया है कि कोई भी प्रशासनिक या अर्ध-न्यायिक प्राधिकारी किसी व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित करने वाला आदेश बिना ठोस कारण बताए पारित नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि आदेश ऐसा होना चाहिए जो खुद अपनी वजह बोले , न कि वह किसी रहस्यमयी पहेली जैसा हो।

यह मामला भू-अभिलेख विभाग के अधीक्षकों की वरिष्ठता से जुड़ा है। याचिकाकर्ता चंद्र भूषण प्रसाद और अन्य ने विभाग के समक्ष आवेदन कर मांग की थी कि अधीक्षक के पद पर उनकी वरिष्ठता 1 जनवरी 1997 से निर्धारित की जाए। शासन ने 14 जुलाई 2006 को एक आदेश जारी किया, जिसमें केवल यह लिखा गया कि 'पुनर्विचार के उपरांत अभ्यावेदन अमान्य किया जाता है'। इस मौन आदेश को याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

न्याय की आत्मा है कारण

  • सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि विभाग का आदेश पूरी तरह से तर्कहीन और मूक था। कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए टिप्पणी की कि किसी भी निर्णय की प्रक्रिया में 'कारण' बताना उतना ही अनिवार्य है जितना कि नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना।
  • प्रभावित व्यक्ति को यह जानने का अधिकार है कि उसके पक्ष या बचाव को किस आधार पर खारिज किया गया। तर्कपूर्ण निर्णय ही न्याय वितरण प्रणाली में वादियों का विश्वास बनाए रखते हैं। कारण बताना मानवाधिकारों का हिस्सा है और यह सत्ता के मनमाने इस्तेमाल पर रोक लगाता है।

कोर्ट ने यह दिए निर्देश

नई अर्जी: याचिकाकर्ता तीन सह्रश्वताह के भीतर सक्षम प्राधिकारी को नया और विस्तृत अभ्यावेदन सौंपेंगे।

सुनवाई का मौका: सक्षम प्राधिकारी निर्णय लेने से पूर्व याचिकाकर्ताओं को व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर प्रदान करेंगे।

तर्कपूर्ण आदेश: प्राधिकारी को तीन महीने के भीतर एक रीजन्ड और स्पीकिंग आदेश पारित करना होगा, जिसमें याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए हर ङ्क्षबदु का तार्किक समाधान हो।

शिक्षा विभाग को हाईकोर्ट का झटका

बीते दिनों ग्वालियर हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग के उस मनमाने फैसले को रद्द कर दिया है जिसके तहत संविदा डेटा एंट्री ऑपरेटरों के वेतन में कटौती की गई थी। जस्टिस आशीष श्रोती की एकलपीठ ने विभिन्न जिला शिक्षा केंद्रों में कार्यरत इन कर्मचारियों की ग्रेड-पे 2400 से घटाकर 1900 करने के आदेश को तर्कहीन और मनमाना करार देते हुए रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि इन कर्मचारियों को पूर्व की भांति 2400 ग्रेड-पे की दर से ही पारिश्रमिक दिया जाए।