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हाईकोर्ट ने दिया आर्डर- ‘बलात्कारी के बच्चे को जन्म देने के लिए नहीं किया जा सकता मजबूर’

हाईकोर्ट ने दिया आर्डर- ‘बलात्कारी के बच्चे को जन्म देने के लिए नहीं किया जा सकता मजबूर’
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हाईकोर्ट ने दिया आर्डर- ‘बलात्कारी के बच्चे को जन्म देने के लिए नहीं किया जा सकता मजबूर’

ग्वालियर। बलात्कार की शिकार नाबालिग बालिका को बलात्कार के आरोपी के बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। ऐसे बच्चे का गर्भपात कराने का बालिका व उसके अभिभावकों को अधिकार है। उच्च न्यायालय ने पीडि़त नाबालिग बालिका व उसकी मां की ओर से गर्भपात के लिए प्रस्तुत याचिका को स्वीकार करते हुए बालिका के 27 सप्ताह के गर्भपात की अनुमति दी है। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि गर्भस्थ का डीएनए सैंपल भी लिया जाए। वहीं न्यायालय ने इस मामले में जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों की उदासीनता व लापरवाही के लिए उन पर विधि अनुसार कार्रवाई के निर्देश भी दिए हैं। न्यायमूर्ति शील नागू ने यह महत्वपूर्ण आदेश दिया है।

बालिका की ओर से यह याचिका डॉक्टरों की टीम द्वारा एमटीपी एक्ट 1971 के तहत गर्भपात से इनकार कर दिए जाने के बाद प्रस्तुत की गई थी। याचिका में कहा गया कि आरोपी द्वारा नाबालिग बालिका से बलात्कार के बाद वह गर्भवती हो गई है। इस मामले में आरोपी के खिलाफ बलात्कार तथा पॉक्सो एक्ट व एससीएसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है। पीडि़ता की उम्र 15 साल बताई गई है। याचिका में कहा गया कि उन्हें गर्भपात की अनुमति दी जाए तथा इस संबंध में दिशा निर्देश दिए जाए।

नहीं निभाया सरकारी एजेंसियों ने कर्तव्य

न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले में पीडि़ता को सहयोग और सुरक्षा दिलाने के प्रति शासन की एजेंसियां समय पर अपना कर्तव्य निभाने में पूरी तरह असफल रही हैं। बालिका की 15 अक्टूबर 18 को की गई जांच में उसके पेट में 27 सप्ताह का गर्भ है। न्यायालय ने इस संबंध में सभी पक्षों को सुनने के बाद तथा इस संबंध में अब तक दिए गए न्यायिक दृष्टांतों को देखने के बाद उक्त आदेश दिया है। न्यायालय ने कहा कि इस मामले में शासन की एजेंसियों के पास पर्याप्त समय था लेकिन उनकी लापरवाही के कारण उसे चार- पांच माह लग गए। न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता न्यायालय में देर से आने के लिए कतई जिम्मेदार नहीं है।

पीडि़त मुआवजा पाने के लिए स्वतंत्र
इस मामले में याचिकाकर्ता के वकील द्वारा मुआवजे के संबंध में कोई प्रार्थना नहीं की है, लेकिन याचिकाकर्ता चाहे तो मुआवजे की कार्यवाही करने के लिए स्वतंत्र है। न्यायालय ने प्रकरण में पीडि़ता की स्थिति को देखते हुए तत्काल कार्यवाही के निर्देश दिए। शासन से कहा गया कि इस मामले उसका यह कर्तव्य है कि वह दिए गए दिशा निर्देशों का सख्ती से पालन कराए।

एक्ट में 20 सप्ताह दी जाती है अनुमति
एमटीपी एक्ट 1971 के तहत 20 सप्ताह तक ही गर्भपात की अनुमति दी जाती है। इसके बाद ऐसे मामलों में न्यायालय द्वारा अनुमति दी जाती है।

टीम करेगी जांच और लेगी निर्णय

ऐसे मामलों में अभिभावकों को अधिकार
आदेश में कहा गया कि मामले कि गंभीरता को देखते हुए इस याचिका का निराकरण किया जा रहा है। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि पीडि़त एक नाबालिग बालिका इसलिए गर्भपात के लिए उसकी सहमति की आवश्यकता नहीं है। पीडि़त और उसके अभिभावक को संविधान की धारा 21 के तहत अधिकार दिया गया है कि वह ऐसे मामले में निर्णय ले सकते हैं। बलात्कार की शिकार को बलात्कारी के बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।

जिम्मेदारों पर की जाए कार्रवाई
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले में संबंधित पुलिस अधिकारियों द्वारा जिस प्रकार से उदासीनता बरती गई है, उससे पीडि़ता को पांच माह की देरी हुई है। इसके लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ जुवेनाइल एक्ट के तहत कार्रवाई की जाए। न्यायालय ने कहा कि पीडि़ता पर्याप्त मुआवजे की हकदार है। वहीं न्यायालय ने यह प्रकरण जनहित याचिका के लिए योग्य पाते हुए इसे प्रदेश मुख्य न्यायाधिपति के समक्ष भेजे जाने के निर्देश भी दिए। इसके साथ ही न्यायालय ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वे इस संबंध में आवश्यक कार्यवाही करे।