
फोटो सोर्स: पत्रिका
MP News: मध्यप्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग की बड़ी चूक अब हजारों छात्रों के भविष्य पर भारी पड़ सकती है। मास्टर ऑफ सोशल वर्क (एमएसडब्ल्यू) जैसे व्यावसायिक व प्रायोगिक कोर्स का नया पाठ्यक्रम तैयार करने का जिम्मा विभाग ने समाजकार्य के विशेषज्ञों के बजाय समाजशास्त्र के प्रोफेसरों को सौंप दिया। नतीजा यह हुआ कि सोशल वर्क की पहचान माने जाने वाले फील्ड वर्क, केस स्टडी, कम्यूनिटी ऑर्गनाइजेशन और प्रोफेशनल ट्रेनिंग जैसे जरूरी विषय सिलेबस से गायब कर दिए गए और पूरा पाठ्यक्रम समाजशास्त्र की ओर झुक गया है।
शहर के विभिन्न कॉलेजों में इस समय करीब चार हजार से ज्यादा विद्यार्थी एमएसडब्ल्यू की पढ़ाई कर रहे हैं, जबकि पूरे प्रदेश में इनकी संख्या 20 हजार से ज्यादा है। विद्यार्थियों का कहना है कि नया पाठ्यक्रम उनकी व्यावसायिक योग्यता को खत्म कर देगा, जिससे वे न तो सोशल वर्कर माने जाएंगे और न ही समाजशास्त्री।
शिक्षा जगत से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि समाजशास्त्र और समाजकार्य पूरी तरह अलग-अलग विषय हैं। समाजकार्य व्यावसायिक कोर्स है जिसमें 50 फीसदी से ज्यादा हिस्सा प्रैक्टिकल, फील्ड वर्क, इंटर्नशिप और प्रोजेक्ट्स का होता है। समाजशास्त्र मुख्य रूप से सैद्धांतिक विषय है जिसमें केवल शोध पद्धति और थोड़ी-बहुत प्रायोगिक सामग्री शामिल होती है। विभाग ने बिना समझे दोनों विषयों को मिला दिया। यह यूजीसी की बी-2 स्कीम के अनुरूप भी नहीं है।
छात्र संगठनों ने सरकार से मांग की है कि एमएसडब्ल्यू पाठ्यक्रम को तुरंत वापस लेकर सोशल वर्क विषय के प्रोफेशनल विशेषज्ञों की देखरेख में दोबारा तैयार कराया जाए। विभाग की लापरवाही से कॉलेजों में सेशन भी समय पर शुरू नहीं हो पा रहा है। प्रवेश परिक्षा के दो महीने बाद भी कक्षाएं नियमित रूप से शुरू नहीं हो सकी हैं।
एमएसडब्ल्यू कोर्स करने वाले विद्यार्थी अब तक एनजीओ, अस्पतालों, कॉर्पोरेट सीएसआर, श्रम कल्याण और अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स में नौकरी की उम्मीद रखते, लेकिन नया सिलेबस पूरी तरह थ्योरी आधारित हो जाने से अब वे मेडिकल सोशल वर्कर, लैबर वेलफेयर ऑफिसर या सीएसआर विशेषज्ञ जैसी भूमिकाओं के लिए योग्य नहीं रह जाएंगे।
Published on:
18 Sept 2025 02:18 pm
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