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यक्ष की पीड़ा सुन मेघ बने दूत, प्रेयसी को सुनाई व्यथा

यक्ष की पीड़ा सुन मेघ बने दूत, प्रेयसी को सुनाई व्यथा

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KALIDAS

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महाकवि कालीदास रचित नृत्य नाटिका ‘मेघदूत’ का मंचन

कला समूह और तिरुपति रंग सृष्टि की ओर से दो दिवसीय ‘नृत्योत्सव’ की शुरुआत शनिवार को महाकवि कालीदास रचित नृत्य नाटिका ‘मेघदूत’ के साथ की गई। एक घंटे 10 मिनट के इस नाटक में कलाकारों ने बखूबी अभिनय किया, जिसे हर एक ने सराहा। इस नाटक का निर्देशन एवं परिकल्पना होजाई गम्बा सिंह ने की है एवं संगीत पंडित रानू वर्धन का है। इस नाटक का मंचन कला समूह परिसर में किया गया, जिसमें कई गणमान्य लोगों की उपस्थिति रही। मेघदूत काव्य का सबसे मार्मिक और सुंदरम अंश मेघों का यक्ष की पीड़ा सुन उसकी प्रेयसी के पास जाना है, जिसमें रस, छंद, बिम्बों और उपमाओं के द्वारा एक निर्वासित प्रेमी की विरह कथा कही गई है।

ये है कहानी

कुबेर कुपित होकर यक्ष को उसके अपराध के लिए एक वर्ष का निर्वासन दे देते हैं। कारण यह है कि अपनी नई ब्याह कर लाई पत्नी के मोह में डूबा यक्ष कुबेर की पूजा के लिए ब्रह्मकमल लाना भूल गया था। यक्ष ने निविन्ध्या के किनारे उज्जयनी स्थित रामगिरी पर्वत पर कुछ माह बिताए। वहां के आश्रमों की यात्रा की। महाकालेश्वर मंदिर का घंटारव सुना।
आषाण के पहले दिन बरसते मेघों की गर्जना सुनी और उसका मन अपनी प्रेयसी की स्मृति में विकल हो उठा। निर्विन्ध्या नदी में उफान आया। अब मेघ क्षिप्रा नदी की ओर बढऩे लगे। मेघ को यक्ष ने अपना संदेश वाहक दूत बनाया और रामगिरि से अलकापुरी तक की यात्रा का सारा मार्ग बता दिया। मेघ यक्ष की पीड़ा से अभिभूत होकर अलकापुरी जाते हैं और उसका संदेश प्रिये को देते हैं। कुबेर भी अब तक शांत हो गए होते हैं और यक्ष को लौट आने की अनुमति देते हैं।

ये रहे पात्र
यक्ष- राघवेन्द्र सिंह भदौरिया, यक्षिणी-साधना राजावत, बादल- अमितेश देवेन्द्र ,रोतिया मयंक, राजहंस- सतीश यश, बॉबी, अमर, कुबेर- विनीत शर्मा, नदी- अनुषा, अनुजा, दामिनी, विनीता, बिजली- शक्ति यादव, दीपक, उमंग, नट- एमके होजाई गम्बा सिंह, नटी- वैशाली।