
Guest Scholars (Photo Source: AI Image)
MP News: हाईकोर्ट की एकल पीठ ने मध्यप्रदेश के विभिन्न सरकारी स्वायत्त कॉलेजों में कार्यरत अतिथि विद्वानों को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि सरकार किसी कॉलेज में नियमित सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति या स्थानांतरण करती है, तो वहां कार्यरत अतिथि विद्वानों को पद छोड़ना ही होगा। जस्टिस आशीष श्रोती की एकल पीठ ने सरकार की 'पीएचएम कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस' नीति को छात्रों के हित में सही ठहराते हुए अतिथि विद्वानों की याचिकाओं को खारिज कर दिया है।
डॉ. अलका यादव सहित अन्य अतिथि विद्वानों ने कोर्ट में याचिका दायर कर 8 अक्टूबर 2025 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत नियमित प्राध्यापकों को उनके कॉलेजों में पदस्थ किया गया था। इसके बाद याचिकाकर्ताओं को 'फॉलन आउट' (सेवा से बाहर) घोषित कर दिया गया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि उनका अनुबंध 30 जून 2026 तक है, इसलिए उन्हें सत्र के बीच में नहीं हटाया जा सकता है।
सुनवाई के दौरान सरकारी अधिवक्ता सोहित मिश्रा ने कोर्ट को बताया कि उच्च शिक्षा विभाग ने प्रदेश के 55 'प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस' और 13 सरकारी स्वायत्त कॉलेजों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक नीति बनाई है। इसके तहत मेरिट के आधार पर 535 बेहतरीन प्राध्यापकों का चयन कर उन्हें इन कॉलेजों में भेजा गया है। यह पूरी कवायद छात्रों के बेहतर भविष्य और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए की गई है, न कि किसी दुर्भावना से।
नियमित जॉइनिंग पर हटना अनिवार्यः जैसे ही कोई नियमित कर्मचारी कार्यभार ग्रहण करता है, अतिथि विद्वान को पद खाली करना होगा।
सत्र के बीच में बदलाव वैधः सरकार को यह अधिकार है कि वह कार्य की आवश्यकता के अनुसार स्टाफ की तैनाती करें ।
अन्य कॉलेजों में मिली जगहः कोर्ट ने यह भी नोट किया कि फॉलन आउट होने के बाद कई याचिकाकर्ताओं को दूसरे कॉलेजों में जिम्मेदारी दी गई है, जहां जॉइन भी कर लिया है।
हाईकोर्ट की एकल पीठ ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर एक बड़ा आदेश पारित किया है। जस्टिस आनंद सिंह बहरावत की एकल पीठ ने स्पष्ट किया है कि कोई भी प्रशासनिक या अर्ध-न्यायिक प्राधिकारी किसी व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित करने वाला आदेश बिना ठोस कारण बताए पारित नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि आदेश ऐसा होना चाहिए जो खुद अपनी वजह बोले , न कि वह किसी रहस्यमयी पहेली जैसा हो।
यह मामला भू-अभिलेख विभाग के अधीक्षकों की वरिष्ठता से जुड़ा है। याचिकाकर्ता चंद्र भूषण प्रसाद और अन्य ने विभाग के समक्ष आवेदन कर मांग की थी कि अधीक्षक के पद पर उनकी वरिष्ठता 1 जनवरी 1997 से निर्धारित की जाए। शासन ने 14 जुलाई 2006 को एक आदेश जारी किया, जिसमें केवल यह लिखा गया कि 'पुनर्विचार के उपरांत अभ्यावेदन अमान्य किया जाता है'। इस मौन आदेश को याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
Updated on:
03 May 2026 01:43 pm
Published on:
03 May 2026 01:40 pm
बड़ी खबरें
View Allग्वालियर
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
