
शिवपुरी। शहर के पटेल नगर में संचालित बाल आश्रम में रहने वाली अनाथ बच्चियों को नशीली दवाएं देकर उनके साथ दुष्कर्म किया जाता था। केस दर्ज करने के बाद जब पुलिस ने अनाथ आश्रम की तलाशी ली तो उसमें नशीली दवाओं के साथ कई प्रतिबंधित वस्तुएं भी मिलीं थीं। सोमवार को विशेष न्यायाधीश अरुण कुमार वर्मा ने सांय लगभग 5 बजे पिता-पुत्री को दोषी करार दिया और फिर उठकर चले गए। लगभग डेढ़ घंटे बाद न्यायाधीश फिर अपनी कुर्सी पर बैठे और उन्होंने शैला अग्रवाल व उसके पिता केएन अग्रवाल को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। सजा सुनकर शैला अग्रवाल न्यायालय में फूट-फूट कर रोने लगी। न्यायालय के इस फैसले को शहरवासियों से सराहा।
बरसों से अनाथ आश्रम का संचालन करने वाली एडवोकेट शैला अग्रवाल अपने घर में ही मासूम बच्चियों व लावारिस मिलने वाले बच्चों का भरण पोषण कर रही थी। घर में उसके रिटायर्ड प्रोफेसर पिता केएन अग्रवाल के अलावा मानसिक विक्षिप्त भाई राजू उर्फ योगेश अग्रवाल भी निवास करते थे। अनाथ बच्चों का पालन पोषण किए जाने की वजह से इस आश्रम में न केवल नेताओं से लेकर अधिकारी वहां जाते थे, बल्कि कई परिवार तो अपने बच्चों का जन्मदिन इन अनाथ बच्चों के बीच मनाते थे।
बाल आश्रम की वजह से शैला अग्रवाल के संपर्क भी कई नामी-गिरामी लोगों से थे, इसलिए वहां होने वाले किसी भी अत्याचार के खिलाफ मासूम बच्चे आवाज नहीं उठा पाते थे। इतना ही नहीं इस आश्रम में रहने वाली एक किशोरी की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो चुकी थी, लेकिन वो मामला भी प्रभाव के चलते दबा दिया गया। कहते हैं कि पाप का घड़ा भरने के बाद फूटता जरूर है और यही सब शैला अग्रवाल के साथ भी हुआ।
नवंबर 2016 को आश्रम की कुछ बच्चियों ने अपने साथ हो रही ज्यादती के बारे में जब बाल आयोग के सदस्यों को बताया, तो शैला पर कार्रवाई करने से पहले पुलिस व प्रशासन के साथ महत्वपूर्ण बैठक हुई। इसके बाद 15 नवंबर की रात को पुलिस ने अचानक बाल आश्रम पर छापा मारा और वहां रहने वाली बच्चियों से पूछताछ शुरू की। अनाथ बच्चियों ने जब अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों की फेहरिस्त बताई तो सुनने वालों के होश फाख्ता हो गए। बिना देर किए तत्कालीन कलेक्टर ओपी श्रीवास्तव एवं पुलिस अधीक्षक यूसुफ कुर्रेशी ने इस मामले में बाल संरक्षण सहित गंभीर धाराओं में प्रकरण दर्ज करवाया।
84 पेज का फैसला, 51 थे गवाह: बाल आश्रम में मासूमों के साथ दुष्कर्म के इस मामले में 84 पेज का फैसला तैयार किया गया। इस मामले में 51 गवाह थे, जिनमें से 38 लोगों ने गवाही दी। इस केस की विवेचना तत्कालीन अजाक डीएसपी आरकेएस राठौर व महिला थाना प्रभारी आराधना डेविस ने की थी। जबकि बाल आयोग की टीम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बच्चियों को छात्रावास में रखने के साथ ही जब उनसे अलग-अलग बातचीत की, तो आश्रम में अनाथ बच्चियों के साथ होने वाले अत्याचारों की फेहरिस्त लंबी होती चली गई। यही वजह है कि दोषी पिता-पुत्री को जीवित रहने तक जेल में रहने की सजा सुनाई गई।
मैं न्यायालय के निर्णय से कतई संतुष्ट नहीं हूं और इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील करेंगे।
विजय तिवारी, आरोपियों के वकील
अब नाबालिगों पर गंदी नजर डालने वाले हजार बार सोचेंगे। न्यायालय के निर्णय से समाज में यह संदेश भी गया है कि जैसी करनी-वैसी भरनी।
धैर्यवर्धन शर्मा, पैनलिस्ट मप्र भाजपा
Published on:
08 May 2018 04:34 pm
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