
पत्रिका की ग्राउंड रिपोर्ट में हकीकत चिंताजनक (Photo Source- Input)
MP Farmers : मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में सरकारी सिस्टम की सुस्ती और बद इंतजामी ने अन्नदाता को सड़क पर ला दिया है। उपार्जन शुरू हुए 27 दिन बीत चुके हैं, लेकिन हालात 'जस के तस' हैं। प्रशासन ने किसानों की सुविधा के लिए टोकन और स्लॉट बुकिंग की जो व्यवस्था बनाई थी, वो अब पूरी तरह फेल साबित हो रही है। किसान स्लॉट के हिसाब से ट्रॉली लेकर केंद्र पहुंच तो रहे हैं, लेकिन वहां ट्रैक्टरों की लंबी कतारें देखकर उनके होश उड़ रहे हैं।
आलम यह है कि, एक ट्रॉली गेहूं तुलवाने के लिए किसान को भीषण गर्मी में 8-8 दिन तक केंद्रों पर रातें काटनी पड़ रही हैं। कई किसानों के तो स्लॉट की तारीख भी निकल गई है, लेकिन नंबर नहीं आया। स्लॉट को फिर से री-शेड्यूल कराने के लिए किसान को कलेक्ट्रेट तक आना पड़ रहा है।
सेंटर पर आवेदन लेकर ग्वालियर भेजने की व्यवस्था नहीं है। इसके अलावा एक केंद्र पर कागजों में 6 तोल कांटे चलाए जा रहे हैं, लेकिन हकीकत में तीन से चार ही चल रहे हैं। इससे इंतजार लंबा हो रहा है।
डबरा और भितरवार के उपार्जन केंद्रों पर स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है। नागरिक आपूर्ति विभाग की कागजी रिपोर्ट में भले ही केंद्रों पर मात्र 25 ट्रॉलियां खड़ी दिखाई जा रही हों, लेकिन पत्रिका की ग्राउंड रिपोर्ट में हकीकत कुछ और ही सामने आई है। मौके पर 150 से अधिक ट्रॉलियां कतार में खड़ी मिलीं। 15 अप्रैल से शुरू हुए उपार्जन में अब तक लक्ष्य का एक-तिहाई हिस्सा भी पूरा नहीं कर पाया है। जिले में 15 लाख क्विंटल गेहूं की खरीदी होनी थी, लेकिन सरकारी कांटा अब तक महज 4 लाख क्विंटल तक ही पहुंच पाया है, जबकि मंडियों में निजी खरीदी 16 लाख क्विंटल का आंकड़ा पार कर चुकी है।
-जिले में उपार्जन की समीक्षा बैठक के दौरान कलेक्टर रुचिका चौहान ने अधिकारियों को जमकर फटकार लगाई। बैठक के दौरान सहकारिता विभाग के अफसरों ने तर्क दिया कि, मजदूरों की कमी के कारण तोल की चाल धीमी है। इसपर कलेक्टर चौहान ने नाराजगी जताते हुए निर्देश दिए कि, जो कर्मचारी व्यवस्था बनाने में अक्षम हैं, उन्हें तत्काल निलंबित किया जाए। उन्होंने अधिकारियों को दफ्तर छोड़ फील्ड में उतरकर मॉनिटरिंग करने के सख्त निर्देश दिए हैं। उन्होंने ये भी कहा कि, जब तोल की गलति धीमी चल रही है तो मजदूरों की संख्या क्यों नहीं बढ़ाई गई?
उपार्जन के पहले दिन केंद्रों पर किसानों का माला पहनाकर और तिलक लगाकर स्वागत किया गया था। बड़े-बड़े दावे थे कि, ओआरएस, ठंडे पानी और छांव की मुकम्मल व्यवस्था होगी, लेकिन भीड़ बढ़ते ही ये सारे दावे हवा हो गए। केंद्र गांवों से दूर होने के कारण किसानों के सामने खाने का भी संकट खड़ा हो गया है।
ट्रॉली चोरी होने या नंबर कटने के डर से किसान केंद्र छोड़कर कहीं जा नहीं पा रहे। मजबूरन भीषण गर्मी में गांव से खाना मंगवाकर ट्रैक्टरों के नीचे सोकर रातें काटने को ये किसान मजबूर हैं।
Published on:
12 May 2026 12:00 pm
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