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52 साल की महिला को IVF की मंजूरी, उम्र बंधन नहीं, MP हाइकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

Approval for IVF: कोर्ट ने कहा कि यदि महिला चिकित्सकीय रूप से फिट है, तो केवल कानूनी उम्र सीमा के आधार पर उसे मातृत्व के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
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Approval for IVF:हाइकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला (Photo Source - freepik)

Approval for IVF:हाइकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला (Photo Source - freepik)

MP High Court:मध्यप्रदेश हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने एक संवेदनशील मामले में फैसला सुनाया। इस फैसले में मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए मातृत्व के अधिकार को कानून की तकनीकी बाधा से ऊपर रखा है। कोर्ट ने कहा कि यदि महिला को डॉक्टर चिकित्सकीय रूप से फिट मानते हैं, तो केवल कानून में दर्ज उम्र सीमा किसी मां को दोबारा मातृत्व का सुख पाने से नहीं रोक सकती। हाईकोर्ट ने संवेदनशील मामले में कानून की तकनीकी बंदिशों से ऊपर मानवीय संवेदना को तरजीह देते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

जस्टिस विशाल मिश्रा की सिंगल बेंच ने 52 वर्षीय याची इन विट्रो महिला को फर्टिलाइजेशन (आइवीएफ) तकनीक के जरिए संतान प्राप्ति की अनुमति दे दी। इस तकनीकी पेंच के खिलाफ दंपती ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने केरल और कलकत्ता हाईकोर्ट के उन फैसलों की मिसाल दी, जहां असाधारण हालात में उम्र सीमा में ढील दी गई थी।

महिला है मेडिकली फिट

दरअसल, दंपती के इकलौते 21 वर्षीय बेटे की पीलिया के कारण मौत हो गई थी। दंपती अकेले रह गए। उम्र के इस पड़ाव पर प्राकृतिक रूप से माता-पिता बनना संभव नहीं था तो विज्ञान की शरण ली। मेडिकल जांच में महिला को गर्भधारण के लिए फिट पाया गया। हालांकि अस्पताल ने कानूनी तर्क दिया कि आइवीएफ के लिए महिला की अधिकतम आयु सीमा 50 वर्ष तय है।

सिर्फ उम्र के लिहाज से आवेदन अस्वीकार नहीं

इस पूरे मामले में दंपती ने शपथपत्र देकर यह भी स्पष्ट किया कि आईवीएफ प्रक्रिया से जुड़े सभी संभावित जोखिमों और परिणामों की जिम्मेदारी वे स्वयं वहन करेंगे। साथ ही साथ चिकित्सकों को किसी भी कानूनी दायित्व से मुक्त रखा जाएगा। सभी तथ्यों, मेडिकल रिपोर्ट और न्यायिक दृष्टांतों पर विचार करने के बाद कोर्ट ने याचिका स्वीकार कर दंपती को अपनी पसंद के किसी भी मान्यता प्राप्त संस्थान में आईवीएफ कराने की अनुमति दे दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संबंधित संस्थान महिला की चिकित्सकीय स्थिति के आधार पर अंतिम निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होगा, लेकिन केवल 52 वर्ष की आयु को आधार बनाकर आवेदन अस्वीकार नहीं किया जा सकेगा।

सिर्फ वरमालावैध नहीं, 7 फेरे जरूरी

बीत दिन पहले एक अन्य मामले में ग्वालियर हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि सप्तपदी (सात फेरे) के बिना हिन्दू विवाह वैध नहीं माना जा सकता। नोटरी को विवाह या तलाक से जुड़े दस्तावेज तैयार करने का कोई अधिकार नहीं। इसी के साथ कोर्ट ने दतिया के नोटरी राघवेंद्र समाधिया का लाइसेंस तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर कारण बताओ नोटिस जारी किया है। जस्टिस जीएस अहलूवालिया व अनुराधा शुक्ला की युगलपीठ ने कहा, विधि मंत्रालय ने 10 अक्टूबर 2024 को नोटरी का विवाह/तलाक के दस्तावेज बनाना प्रतिबंधित किया है। फिर भी नोटरी ने 'विवाह व पंजीयन लिखतम' बनाया। यह गंभीर कदाचार है।