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MP के शिवेंद्र को हॉकी के लिए मिला द्रोणाचार्य अवार्ड, पत्रिका से बोले- खिलाड़ी तैयार करना अगला लक्ष्य

द्रोणाचार्य अवार्ड मेरा मुकाम नहीं, मंजिल अभी और भी है: शिवेन्द्र सिंह

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National Sports Awards 2023

ग्वालियर। द्रोणाचार्य अवार्ड मिलने से खुश शिवेन्द्र ने कहा, यह अवार्ड मुझे बहुत ही युवावस्था में मिल गया है, इसकी मुझे खुशी भी है, लेकिन मैं अभी यहीं ठहरने वाला नहीं हूं। इस अवार्ड ने मुझे मोटिवेट किया है, अब हॉकी के लिए और बेहतर काम करूंगा। मप्र युवा खिलाडिय़ों को तैयार कर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा सका, तो यह मेरे लिए गर्व की बात होगी। शिवेन्द्र से ये बात द्रोणाचार्य अवार्ड मिलने के बाद पत्रिका से बातचीत में कही। शिवेंद्र को द्रोणाचार्य की घोषणा मिलने के बाद परिवार में खुशी की लहर है। ग्वालियर के शिवेन्द्र सिंह चौधरी वर्तमान में भारतीय हॉकी टीम के कोचिंग स्टाफ में शामिल है।

मप्र में हॉकी खिलाड़ी तैयार करना अगला लक्ष्य

शिवेंद्र ने कहा, ग्वालियर में हॉकी सीखी और आज इस मुकाम तक पहुंच सका। इसलिए भविष्य में ग्वालियर और मध्यप्रदेश में हॉकी प्रतिभाओं को खोजकर तैयार करना मेरा लक्ष्य है। इस दिशा में आगे जरूर कुछ काम करने की योजना है और अपने अनुभवों का लाभ देश में हॉकी को आगे ले जाने में और कैसे दे सकें, यह प्रयास भी निरंतर जारी रखना चाहूंगा। मप्र सरकार यदि मेरी सेवाएं लेगी तो मैं तैयार हूं।

नौ साल की उम्र से शुरू कर दिया हॉकी खेलना

ग्वालियर में जन्मे शिवेंद्र सिंह चौधरी ने नौ साल की उम्र में हॉकी स्टिक को थाम लिया था। शिवेन्द्र के बड़े भाई भी हॉकी खिलाड़ी हैं, जिसको देखकर उसने भी हॉकी खेलना शुरू कर दिया। साल 2006 में जब पहली बार भारतीय टीम में चयन हुआ, तब सोचा शायद ओलंपिक खेलने का सपना पूरा हो सकता है। उसके बाद अपने सपनों को पूरा करते हुए अंतरराष्ट्रीय हॉकी प्लेयर शिवेंद्र सिंह दो बार ओलंपिक खेल चुके हैं और कई अंतरराष्ट्रीय खिताब और मेडल अपने नाम कर चुके हैं।

सफलता के लिए किया काफी संघर्ष

शिवेन्द्र ने कहा, बचपन से ही हॉकी के जुनून में घर परिवार से दूर रहना पड़ा। जब नौकरी लग गई, इसके बाद भी संघर्ष जारी रहा। खेल, नौकरी से लेकर खाना बनाने तक सब खुद को ही करना पड़ता थे, जब मेरे भाइयों की शादी हुई, पिता बीमार हुए यहां तक कि मेरी बेटी बीमार हुई तब भी मैं नहीं आ सका, क्योंकि देश के लिए, हॉकी के लिए काम मे जुटा था। लेकिन यही सफलता की सीढिय़ां हैं। अपनी पत्नी और परिवार ने हर समय मुझे सपोर्ट किया जिसके सहारे पर ही मैं आज यहां तक पहुंच सका।

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