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तानसेन का मकबरा : जरा यहां होकर आइए जहां आज भी होती है सद्भाव की जुगलबंदी

शायद ही ऐसी नायाब जगह कहीं और होगी, जहां एक तरफ मकबरे पर बैठकर हरिकीर्तन और रामधुन चल रही हो वहीं दरगाह से इबादत और बंदगी की तान छिड़ी हो।

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Tansen ka Makbara

तानसेन का मकबरा; जरा यहां होकर आइए जहां आज भी होती है सद्भाव की जुगलबंदी

ग्वालियर. वो खूबसूरत जगह ग्वालियर की विरासत संगीत सम्राट तानसेन का मकबरा है। यहां की सामाजिक सद्भावना की खूबसूरत मिसाल है। यह परंपरा सालों बाद भी कायम है। विश्व विख्यात तानसेन समारोह का आगाज भी कुछ ऐसा ही होता है। तानसेन की स्मृति में आयोजित होने वाले अंतरराष्ट्रीय तानसेन समारोह के शुभारंभ दिवस पर सुबह तानसेन की समाधि पर सामाजिक समरसता के सजीव दर्शन होते हैं। पारंपरिक रूप से हरिकथा व मीलाद के गायन के साथ तानसेन समारोह का शुभारंभ होता है, जिसकी प्रस्तुति ढोलीबुवा महाराज करते हैं। साथ ही तानसेन के आध्यात्मिक गुरू मोहम्मद गौस की मजार पर चादर पोशी की रस्म भी अता फरमाई जाती है। आज भी ग्वालियर के लोग इस को पंरपरा को बदस्तूर निभा रहे हैं।

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IMAGE CREDIT: Gwalior Patrika

मियां तानसेन का पैगाम ग्वालियर शहर के दिल-ओ-दिमाग में बसा
तानसेन ग्वालियर की रग-रग में समाए हैं। उनको संगीत की तालीम गुरु हरिदास से हासिल हुई। तानसेन उनको जितना सम्मान देते थे, उतनी ही श्रद्धा अध्यात्मिक गुरु मोहम्मद गौस में थी। उनकी हसरत थी कि उनके दुनिया से अलविदा कहने के बाद गौस बाबा के बाजू में उनको स्थान दिया जाए। पर इस बात का ख्याल रखा जाए कि वो गुरु स्थान से ऊपर न हो। यहां हरिभजन करते मोतीलाल शास्त्री कहते हैं हमारे बुजुर्गों की प्रेरणा से हम उनकी मर्यादा का पालन करते हैं। यहां हमारे अंदर जाति, धर्म का कोई भेद नही हैं। मोहम्मद गौस हमारे संगीतज्ञ तानसेन के गुरु हैं। संगीत में उनकी विश्व ध्वनि है, उन तानसेन ने अपने स्वर और लय से सभी को जोड़ा है। इसलिए हम आज भी यहां बैठकर गा पाते हैं, रघुपति राघव राजाराम...।

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शंहशाह को नाज था तानसेन पर
जब अबकर ने अपने दरबार के नवरत्नों में से एक तानसेन से कहते हैं मियां, ग्वालियर में हम आपके मेहमान हैं। तानसेन कहते हैं जहापनाह! खुशामदीद करते हैं। शहर ए गरीब को फक्र है। इस बात से खुश होकर अकबर फरमाते हैं, ये शहर ए हबीब! आप जानते हैं हम आपके फन की कितनी कद्र करते हैं। आप हमारे नवरत्नों में से एक हैं। हमें आप पर नाज हैं।

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और तानसेन इसे मानते थे ग्वालियर की मिट्टी की रहमत

तब तानसेन बोले, ये बंदा-ए-नाचीज़ जो कुछ भी है इस ग्वालियर की मिट्टी की रहमत है। अबकर उनके अपने शहर से इस जज्बाती जुड़ाव पर कहते हैं आपने सही फरमाया मियां तानसेन। इस अजीम शहर ने हमें तानसेन बख्शा है। आज के इन लम्हों को यादगार बनाने के लिए आइए मियां तानसेन, कुछ ऐसी चीज सुनाइए, जिसे सदियां न भूल सकें। जिसका जादू हमारे दिल-ओ-दिमाग पर ताउम्र नक्श रहे। तानसेन की आवाज की कायल न केवल बादशाह अकबर बल्कि पूरी दुनिया थी, इस बात को ग्वालियर किले पर लाइट एंड शो में इसको सुना जा सकता है।

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मोहम्मद गौस की दरगाह के खादिम सूफी सज्जन खान कहते हैं बाबा 1545 में ग्वालियर आए थे। उनके पास 45 किमी दूर से आए एक दंपती ने कहा कि शादी के कई वर्ष बाद भी नि:संतान हैं। गौस बाबा ने दुआ की। उनके आशीर्वाद से दंपती के यहां तानसेन का जन्म हुआ। स्वामी हरिदास ने संगीत सिखाया। गौस बाबा का 1562 को किले से यहां आकर दफनाया। तब बादशाह अकबर ने इसकी बुनियाद रखी। तानसेन जी की जो वसीयत थी जब भी उनका देहांत हो उनको गौस बाबा के चरणों में लाया जाए, पर इससे ऊंचा न बनाया जाए।

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