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Oscar 2019: यूपी के एक छोटे से गांव में बनी फिल्म को मिला ऑस्कर, जाने, फिल्म में किसने किया रोल,जाने पूरी खबर

-Period: End of sentence ने लहराया परचम-'डॉक्यूमेंट्री शॉर्ट सब्जेक्ट में फिल्म को ऑस्कर -हापुड़ की स्नेहा और गांव वालों पर बनी है फिल्म

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hapur

Oscar 2019: यूपी के एक छोटे से गांव में बनी फिल्म को मिला ऑस्कर, जाने, फिल्म में किसने किया रोल,जाने पूरी खबर

हापुड़।Oscar 2019 की घोषणा कर दी गई है। अमेरिका में कैलिफॉर्निया के डॉल्‍बी थिएटर में हुए इस आयोजन में विजाताओं के नामों का ऐलान किया गया। ऑस्कर नाम सुनते ही अक्सर दिमाग में हॉलिवुड फिल्म का नाम घुमने लगता है। लेकिन इस बार किसी विदेशी फिल्म ने नहीं बल्कि अपने देश की फिल्म ने ऑस्कर जीती है। जी हां उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के एक गांव की युवती पर बनी फिल्म को ऑस्कर अवॉर्ड 2019 मिला है। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि ये फिल्म ग्रामीण परिवेश में पीरियड यानी माहवारी के समय महिलाओं को होने वाली समस्या और पैड अनुपलब्धता को लेकर बनाई गई डॉक्यूमेंटरी है। फिल्म का नाम है 'पीरियड: द एंड ऑफ सेंटेंस' है।
हापुड़ के बेटियों ने किया कमाल

हाल ही में अक्षय कुमार की फिल्म पैडमेन तो आपको याद होगी, जो देश के कुछ हिस्सों में महिलाओं के लिए अभिशाप बन चुके माहवारी के उपर बनाई गई थी। कुछ इसी तरह की फिल्म बनी period the end of sentence बनाई गई। जिसमें पश्चिमी यूपी के हापुड़ जिले के काठीखेड़ा गांव की स्नेहा की कहानी है। जिस लड़की ने अपने संकल्प और मेहनत से न केवल सीनेटरी पैड बनाने वाली कंपनी में खुद काम करना शुरू किया बल्कि अपनी सहेलियों को भी इससे जोड़ा।

पिता को बताया बच्चों के डायपर बनाने का काम-

फिल्म में नायिका से लेकर जितने लोग भी शामिल है सभी हापुड़ के ही रहने वाले हैं। लेकिन कहानी असलीयत की है। उस लड़की की जो मध्यम वर्गीय परिवार में पली बढ़ी और यूपी पुलिस में जाने के लिए तैयारी कर रही है। लेकिन इस बीच उसके साथ कुछ ऐसा हुआ जिससे स्नेहा की जिंदगी बदल सी गई। दरसल एक संस्था स्नेहा के पास पहुंचती और उससे मासिक धर्म के बारे में पूछती, लेकिन हर लड़की की तरह स्नेहा भी शर्म के मारे कुछ भी नहीं बता सकी। लेकिन इसके बाद स्नेहा ने संस्था के साथ काम करने की ठानी।

घर जाकर उसने इस पर विचार किया और फिर फैसला किया कि वह संस्था के साथ काम करेगी। लेकिन शुरू में इसे लेकर काफी विरोध भी हुआ लेकिन खुद स्नेहा के घरवाले भी राजी नहीं हो रहे थे। लेकिन पिता ने जब बेटी का साथ दिया तो मां को भी मानना पड़ा। इसके बाद शुरू हो गया सफर। लेकिन यहां पिता को बताया गया कि संस्था बच्चों के डायपर बनाने का काम करती है।

फिल्म बानने में भी आई कठिनाई-

सफर तो शुरू हो चुका था, गांव की ही कुछ महिलाएं संस्था से जुड़ कर पैड बनाने के काम करने लगी। लेकिन कुछ दिन बाद हापुड़ कॉर्डिनेटर शबाना के साथ कुछ विदेशी आ गए। उन्होंने बताया कि महिलाओं के मासिक धर्म को लेकर फिल्म बनानी है। लेकिन फिल्म के नाम पर कोई भी सामने आने को राजी नहीं हुआ फिर स्नेहा ने हिम्मत जुटाई और परिवार को मनाया। तब गांव के लोग विरोध करने लगे।

कॉर्डिनेटर शबाना बताती हैं कि जब गांव में फिल्म के लिए सेट लगया गया तो कुछ लोगों ने काफी विरोध किया। कहा गया कि गांव की महिलाओं को बहकाया जा रहा है। कई बार लगा कि फिल्म नहीं बन पाएगी अब , लेकिन गांव की सुमन के सहयोग से लोगों को मनाया गया। महिलाओं को समझाने के लिए छुप-छुप कर बात की जाती थी। अब डॉक्यूमेंटरी पीरियड. एंड ऑफ सेंटेंस ने ऑस्कर अवार्ड के शॉर्ट सब्जेक्ट डॉक्यूमेंटरी वर्ग में अवार्ड जीता है। इससे जुड़ी हापुड़ की दो बेटियां भी यह पुरस्कार लेने ऑस्कर समारोह में भाग लेने के लिए अमेरिका पहुंची हैं। इस फिल्म को रयाक्ता जहताबची और मैलिसा बर्टन ने निर्देशित किया है। जबकि गुनीत मोंगा निर्माता हैं।