6 फ़रवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

गांवों को प्रदूषण मुक्त बनाने जिले के तीनों ब्लाकों में लगेंगी प्लास्टिक मैनेजमेंट यूनिट

- हरदा ब्लाक से शुरुआत के लिए प्रशासन के सहयोग से जमीन तलाशी जा रही- स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत होगा काम

3 min read
Google source verification
गांवों को प्रदूषण मुक्त बनाने जिले के तीनों ब्लाकों में लगेंगी प्लास्टिक मैनेजमेंट यूनिट

गांवों को प्रदूषण मुक्त बनाने जिले के तीनों ब्लाकों में लगेंगी प्लास्टिक मैनेजमेंट यूनिट,गांवों को प्रदूषण मुक्त बनाने जिले के तीनों ब्लाकों में लगेंगी प्लास्टिक मैनेजमेंट यूनिट,गांवों को प्रदूषण मुक्त बनाने जिले के तीनों ब्लाकों में लगेंगी प्लास्टिक मैनेजमेंट यूनिट,गांवों को प्रदूषण मुक्त बनाने जिले के तीनों ब्लाकों में लगेंगी प्लास्टिक मैनेजमेंट यूनिट,गांवों को प्रदूषण मुक्त बनाने जिले के तीनों ब्लाकों में लगेंगी प्लास्टिक मैनेजमेंट यूनिट

गुरुदत्त राजवैद्य, हरदा। पन्नियां और प्लास्टिक से बनी अन्य वस्तुएं शहरों के साथ ही गांवों को भी अपनी जकड़ में ले रही हैं। इससे बढ़ते प्रदूषण से निपटने के लिए अब स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत निपटान की पहल की जा रही है। इसी कड़ी में ब्लाक मैनेजमेंट यूनिट लगाई जाएंगी। इसकी शुरुआत हरदा ब्लाक से होगी। जिला पंचायत द्वारा प्रशासन के सहयोग से यूनिट स्थापना के लिए जमीन तलाशी जा रही है।
उल्लेखनीय है कि शहरों की तरह गांवों में भी बायो डिग्रेडेबल (जो सड़-गलकर नष्ट होता है) व नॉन बायो डिग्रेडेबल कचरा निकलता है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के निर्देशानुसार बायो डिग्रेडेबल के रूप में निकलने वाले कचरा को खाद के रूप में परिवर्तित करने के लिए लोगों को प्रेरित किया जाएगा। ग्राम पंचायत स्तर पर भी एक निर्धारित स्थान पर इसे एकत्रित कर खाद तैयार किया जाएगा। तकनीक अपनाकर बनाए जाने वाले खाद को ग्राम पंचायत बेचकर कमाई भी कर सकेंगी। वहीं दूसरी ओर पन्नियों, प्लास्टिक, रबर, जूते-चप्पल, सार्वजनिक कार्यक्रमों में भोजन के दौरान उपयोग किए जाने वाले डिस्पोजल व प्लास्टिक युक्त पातल-दोने, टायर, पाउच आदि को एकत्रित कर यूनिट तक पहुंचाया जाएगा। यहां इसके रिसाइकिलिंग की व्यवस्था रहेगी। कई सामान को कबाड़ के रूप में बेचा जाएगा। वहीं बचे मटेरियल का उपयोग गमले, खिलौने सहित अन्य सामान बनाने में किया जाएगा। खासकर सड़क निर्माण में भी इसका उपयोग करने की योजना है।
जनपद पंचायत करेंगी संचालन
ब्लाक प्लास्टिक मैनेजमेंट यूनिट की स्थापना को लेकर तकनीकी निर्देश फिलहान नहीं आए हैं। हालांकि इनका संचालन जनपद पंचायतों के माध्यम से होना तय माना जा रहा है। निकाय इसके लिए एजेंसी भी तय कर सकते हैं। 16 लाख रुपए खर्च कर लगाई जाने वाली यूनिट के लिए 5000 वर्ग मीटर ऐसी भूमि को देखा जा रहा है जहां से आवागमन की सुविधा और वह स्थान रिहायशी क्षेत्र से दूर हो। विभिन्न गांवों से प्लास्टिक एकत्रित कर यहां भेजा जाएगा।
शहरी कचरे का निपटान भी हो सकेगा
जिला पंचायत सीईओ रामकुमार शर्मा के मुताबिक प्रोजक्ट की शुरुआत हरदा ब्लाक से की जाएगी। इसके लिए जगह तलाशी जा रही है। अनुमान है कि यूनिट संचालन के लायक नॉन बायो डिग्रेडेबल कचरा गांवों में नहीं मिल पाएगा। इसके लिए शहर से निकलने वाली पन्नियों और प्लास्टिक का उपयोग किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि प्रशासन के सहयोग से उपयुक्त भूमि चिह्नित कर कार्य शुरू कराया जाएगा।
क्लस्टर बनाकर लिया जा चुका है कचरा संग्रहण का ट्रायल
उल्लेखनीय है कि करीब तीन साल पहले सरकार ने गांवों से कचरा संग्रहण की योजना को परखने के लिए ट्रायल तो शुरू किया था, लेकिन यह काम ज्यादा दिन नहीं चल सका। ग्रामीण क्षेत्र से निकलने वाले कचरा के निष्पादन के ट्रायल के दौरान देखा गया था कि वाहन पहुंंचने पर इसमें कचरा डालने को लेकर लोगों की कितनी आदत बनती है। इसके लिए जनपद पंचायत क्षेत्र में तीन क्लस्टर बनाकर वहां वाहन भेजे गए थे। एसएलडब्ल्यूएम (सॉलिड लिक्विड वेस्ट मैनेजमेंंट) के ट्रायल के दौरान एक क्लस्टर में 10 से 11 ग्राम पंचायतें शामिल की गई थी। हालांकि यह काम ज्यादा दिन नहीं चला था। ग्राम पंचायतों के पास सफाई को लेकर फंड नहीं होने से भी इस तरह के कार्य गति नहीं पकड़ सके। नर्मदा किनारे बसी तीर्थनगरी हंडिया की ही बात की जाए तो घाटों पर प्लास्टिक कचरे का अंबार रहता है। इसे फेंकने की व्यवस्था ने होने से यह किनारों पर पड़ा रहता है। नदी में बाढ़ आने पर इसके पानी में मिलने से प्रदूषण फैल रहा है। करीब 7 हजार की आबादी वाले कस्बे में ४00 मकान व 150 हैं। जिला पंचायत के निर्देश पर पहले यहां कचरा संग्रहण वाहन जाता था। उस समय 5 रुपए रोज दुकानदारों से लेने को कहा गया था। कुछ लोगों ने ही यह राशि दी। अधिकारियों ने कहा था सफाई का खर्च ग्राम पंचायत खुद निकाले। इसके प्रयास किए, लेकिन लोग सफाई के नाम पर पैसे नहीं देते थे। इसके चलते यह व्यवस्था बाद में बंद हो गई।