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बच्चों की मानसिक बीमारी है ऑटिज्म

इसे स्पेक्ट्रम डिसऑडर्र (ASD) भी कहा जाता है। इसमें बच्चा सामाजिक तौर पर खुद को जोड़ नहीं पाता है। बच्चा अपनी भावनाओं को स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं कर पाता है। ऑटिज्म की जांच के लिए कोई मेडिकल टेस्ट उपलब्ध नहीं है।

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ऑटिज्म को ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑडर्र (ASD) भी कहा जाता है। इसमें बच्चा सामाजिक तौर पर खुद को जोड़ नहीं पाता है। बच्चा अपनी भावनाओं को स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं कर पाता है। ऑटिज्म की जांच के लिए कोई मेडिकल टेस्ट उपलब्ध नहीं है। बच्चे के व्यवहार और विकास को देख डॉक्टर इसे पहचानते हैंI डेढ़ साल या इससे कम उम्र के बच्चे में इसके लक्षण दिख सकते हैं। उम्र बढ़ने के साथ ही इसके लक्षणों के आधार पर पहचान होती है। ऑटिज्म की पहचान देरी से होने पर इलाज में समस्या आती है। ऑटिजम की समस्या अधिकतर 10 वर्ष तक के बच्चों में होती है। देश में 10 वर्ष तक के 100 में से एक बच्चे को यह परेशानी होती है।

ऑटिज्म के संभावित लक्षण
कुछ लक्षणों के आधार पर पेरेंट्स इसे समझें और डॉक्टरी परामर्श लें, जैसे- इससे पीड़ित बच्चे सामान्य बच्चों की तरह नहीं बोल पाते हैं। ऑटिज्म का रोगी लोगों से नजरें मिलाकर बात करने से बचता है। किसी बात पर प्रतिक्रिया देने में ऐसे बच्चों को अधिक समय लगता है। एक ही काम को बार-बार दोहराना इनकी आदत में शुमार होता है। इससे पीड़ित बच्चे बातों को अनसुना कर देते और जवाब नहीं देते हैं। यह कोई बीमारी नहीं है बल्कि एक प्रकार की मानसिक अवस्था है। इससे ग्रसित बच्चों का मानसिक विकास सामान्य से धीमा होता है।

ऑटिज्म में ऐसे होता है बचाव
अगर इसकी पहचान शुरुआत में हो जाए तो जल्द सुधार संभव है। बच्चे की सीखने की क्षमता को प्रयास से बढ़ाया जा सकता है। इसमें बच्चे के बोलने, व्यवहार और चलने पर ध्यान देते हैं। 9,18 और 30 माह की उम्र में ऑटिज्म की स्क्रीनिंग होती है। ऐसे बच्चों का इलाज विशेष प्रशिक्षण वाले डॉक्टर से ही करवाएं। चाइल्ड न्यूरोलॉजिस्ट या चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट से इलाज करवाएं।

संभावित कारण
ऑटिज्म होने का मुख्य कारण जन्म संबंधी दोष, आनुवांशिक कारण, गर्भ के समय खानपान में लापरवाही या मिनरल्स की कमी होना है। इसके साथ ही गर्भावस्था के दौरान मां को किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित होना, गर्भ के समय मां को तनाव, ब्रेन की गतिविधियों में असामान्यता, बच्चे का समय से पहले जन्म या गर्भ में ठीक से विकास ना होना भी कारण हो सकता है। लड़कियों की तुलना में लड़कों को इसकी आशंका अधिक रहती है।

ऑटिज्म में बचाव ही इलाज
ऑटिज्म विकास संबंधी बीमारी है, पूरी तरह से ठीक नहीं होता है। ऑटिज्म के इलाज के लिए कोई विशेष दवा नहीं होती है। रोगी को सही प्रशिक्षण और परामर्श देने से हालत में सुधार होता है। सामान्य जीवन बेहतर करने वाली कुछ दवाइयां इसमें देते हैं। इन दवाइयों से बच्चों में एकाग्रता बढ़ती और दौरों से बचाव होता है। बच्चे का रुटीन और डेंटल चेकअप जरूरी, इससे बचाव होता है। बच्चे को हैल्दी रखने के लिए विटामिन्स और सप्लीमेंट्स देते हैं।

ऑटिज्म पीड़ितों के साथ ऐसा व्यहार करें
इलाज के दौरान बच्चे को अच्छे व्यवहार के लिए प्रेरित करें। बच्चे की देखभाल-बातचीत में विकास जैसी बातों पर ध्यान दें। जरूरत महसूस हो तो बच्चे को स्पीच थैरेपी भी दी जा सकती है। इसमें माता-पिता की सक्रिय भागीदारी भी बहुत जरूरी होती है। वे बच्चे से अच्छी बातचीत करें, बारी-बारी से बच्चे के साथ खेलें। पीड़ित बच्चे को खेल-खेल में नए-नए शब्द सिखाना चाहिए। बच्चे को पहले बातों को समझने और फिर बोलने की ट्रेनिंग दें। बच्चे को तनाव मुक्त रखने की कोशिश करें, इससे राहत मिलती हैI

डॉ. एस. सीतारमन, चाइल्ड न्यूरोलॉजिस्ट