
सुनाई न देने के हर उम्र में अलग कारण
आवाज कान के पर्दे से तीन छोटी हड्डियों मेलियस, इंकस व स्टेपिज से होकर अंदर जाती है। फिर सुनने से जुड़ी नस से होते हुए दिमाग तक पहुंचती और हमें बात समझ में आती है। इस प्रक्रिया में कहीं भी कोई रुकावट या समस्या से सुनने की क्षमता पर असर पड़ता है। यह परेशानी हर उम्र में अलग-अलग कारणों से होती है।
युवाओं में ये कारण प्रमुख
युवाओं में सुनाई न देने वाले प्रमुख कारणों में पर्दे में छेद या मेस्टोइड हड्डी का गलना है। कान की सबसे छोटी हड्डी स्टेपिज का कंपन रुकना, कान में तरल पदार्थ भरना, वैक्स, सिर या कान पर चोट लगना है। तेज आवाज में म्यूजिक सुनने से युवाओं में इस तरह की आशंका बढ़ जाती है। गालसुआ (मंप्स) और खसरा (मीजल्स) आदि के संक्रमण के बाद भी कुछ लोगों में कम सुनने की समस्या होती है। कई बार दवाइयों के रिएक्शन से भी ऐसा हो जाता है।
बच्चों में परेशानी
शिशुओं में यह समस्या जन्मजात, समय पूर्व जन्म (प्रीमेच्योर बर्थ) जेनेटिक कारणों या वंशानुगत बीमारियों से भी होती है। जन्म के बाद कान के पर्दे के पीछे द्रव या पस जमना (ग्लू इयर), पर्दे में संक्रमण और ज्यादा वैक्स जमना भी है।
बुजुर्गों की दिक्कत
अधिक उम्र के कारण भी सुनाई देने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। यह कान के अंदर की हड्डियों और नसों में कमजोरी के कारण होता है। कई बार ब्रेन से जुड़े एकोस्टिक ट्रयूमर, डायबिटीज, सिफ लिस की वजह से भी कम सुनाई देने लगता है।
इन बातों का रखें ध्यान
अगर सुनने की क्षमता घट रही है तो तत्काल डॉक्टर को दिखाएं। कान बहने व जुकाम व कान की चोट को नजर अंदाज न करें। खुद ही इयरबड या कोई चीज कान में न डालें। तेज आवाज से दूर रहें, रात में इयर फोन लगाकर न सोएं।
जन्म से समस्या में इंप्लांट ही विकल्प
कान के अंदर संक्रमण होने पर दवा दी जाती है। अगर कान के पर्दे में छेद या फिर कोई हड्डी गल गई है तो सर्जरी की जाती है। बुजुर्गों में नसों की कमी होने पर सर्जरी नहीं की जा सकती है। इसमें हियरिंग एड लगाया जाता है। वहीं जिन बच्चों में यह समस्या जन्मजात होती है उनके लिए कॉक्लीयर इम्पलांट एकमात्र विकल्प है।
डॉ. शुभकाम आर्य, ईएनटी सर्जन, जयपुर
Published on:
13 Mar 2020 02:59 pm
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