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कील मुहांसों में हल्दी-नीम का ऐसे करें इस्तेमाल

फूल पत्तियों के अर्क से भी बीमारियों को ठीक किया जाता है. जिसे अरोमा थैरेपी कहते हैं. अरोमा थैरेपी त्वचा व बाल के साथ मन को भी स्वस्थ करती है। इसमें एसेंशियल ऑयल्स का प्रयोग किया जाता है जो फूल-पत्तियों व पौधों से बनाया जाता है।

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कील मुहांसों में हल्दी-नीम का ऐसे करें इस्तेमाल

फूल पत्तियों के अर्क से भी बीमारियों को ठीक किया जाता है. जिसे अरोमा थैरेपी कहते हैं. अरोमा थैरेपी त्वचा व बाल के साथ मन को भी स्वस्थ करती है। इसमें एसेंशियल ऑयल्स का प्रयोग किया जाता है जो फूल-पत्तियों व पौधों से बनाया जाता है। यह थैरेपी दिमाग की कार्यविधि को बढ़ाती है। जानते हैं इससे कैसे स्किन को हेल्दी किया जा सकता है.
रूखी (ड्राय) त्वचा के लिए जिरेनियम, रोज, चंदन, नरोली, पचौली कैमोमायिल के तेल की थैरेपी देते हैं। इससे त्वचा का रूखापन खत्म होता है। रक्त संचार बढ़ता है। त्वचा स्वस्थ व चमकदार बनती है। इसके अलावा ऑयली त्वचा के लिए लेमन, बरगामोट, लैवेंडर, मिंट, बेसिल के ऑयल से थैरेपी देते हैं। इससे त्वचा की तैलीय सतह साफ हो जाती है। स्किन की चमक बढ़ती है। दाने भी कम होते हैं।
ऐसे लोग जिनकी त्वचा का टी जोन तैलीय और बाकी रूखा होता है, उन्हें रोज, जिरेनियम, लैवेंडर, जैस्मिन ऑयल की थैरेपी देते हैं। इसके अलावा मैच्योर त्वचा यानी ४० की उम्र के बाद स्किन में लचीलापन कम हो जाता है। झुर्रियां आने लगती हैं। इसके लिए चंदन, एवोकाडो, गाजर के बीज, गुलाब के तेल की थैरेपी देते हैं। इससे त्वचा की लाइनें घटती हैं।
कील-मुहांसे के लिए बेसिल, लेमन ग्रास, कमोमाइल, हल्दी, नीम, पेपरमिंट के तेल से थैरेपी देते हैं। इसके तेल लगाने से कील-मुहांसों में आराम मिलता है। जिनकी त्वचा सेंसेटिव होती है है उन्हें मेनडारिन, लैवेंडर, जैस्मिन, चंदन के तेल की थैरेपी से आराम मिलता है।
चमकती त्वचा के लिए रासायनिक तत्वों से युक्त उत्पाद तुरंत निखार तो लाते हैं पर यह त्वचा की सेहत को नुकसान पहुंचाते हैं। इनके नियमित प्रयोग से त्वचा की रौनक चली जाती है। त्वचा की एजिंग प्रभावित होती है। इसलिए प्राकृतिक चीजों का प्रयोग करें। खूब पानी पीएं।