Patrika Explainer: कोरोना के खतरनाक डेल्टा प्लस वेरिएंट की पूरी कहानी

कोरोना वायरस के नए स्ट्रेन डेल्टा प्लस में इसके स्पाइक प्रोटीन में K417N म्यूटेशन होता है, जिसे औपचारिक B.1.617.2.1 का नाम दिया गया है।

नई दिल्ली। बीते साल से दुनिया भर में कहर बरपाने वाली कोविड-19 महामारी जल्द ही दूर नहीं होने वाली है। वायरस की म्यूटेट करने की क्षमता इसके लंबे वक्त तक पड़ने वाले असर के प्राथमिक कारणों में से एक है। अन्य वायरल संक्रमणों की तरह SARS-CoV-2 तेजी से विकसित हो सकता है और जैसा कि वायरस की दूसरी लहर के दौरान देखा गया है, यह अधिक संक्रामक बन सकता है, तेजी से फैल सकता है और शरीर को वैक्सीन से मिलने वाली या फिर प्राकृतिक सुरक्षा को कमजोर कर सकता है।

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इस महामारी की नई किस्म पहले से मौजूद कोरोना वायरस स्ट्रेन में म्यूटेशन का नतीजा है जिसे 'डेल्टा' के रूप में जाना जाता है और वैज्ञानिक रूप से इसे B.1.617.2 के रूप में भी जाना जाता है। डेल्टा वेरिएशन को शुरुआत में भारत में खोजा गया था, लेकिन हाल ही के महीनों में इसे अन्य देशों में तेज गति से फैलने के लिए खोजा गया है।

नए स्ट्रेन डेल्टा प्लस में इसके स्पाइक प्रोटीन में K417N म्यूटेशन होता है, जिसे औपचारिक रूप से B.1.617.2.1 नाम दिया गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस तरह का पहला सीक्वेंस मार्च 2021 में यूरोप में खोजा गया था।

कोरोना वायरस का एक महत्वपूर्ण घटक यानी स्पाइक प्रोटीन मानव कोशिकाओं में वायरस के प्रवेश को उत्तेजित करता है और संक्रमण का कारण बनता है। हालांकि डेल्टा वेरिएंट की तेज फैलने की क्षमता के बावजूद, भारत में इसका फैलाव काफी सीमित होना निर्धारित किया गया है।

यह कितनी दूर तक फैल गया है?

पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड के मुताबिक, 7 जून 2021 तक वहां 63 वेरिफाइड डेल्टा प्लस जीनोम थे। GISAID के अनुसार, ये कनाडा, जर्मनी, रूस, नेपाल, स्विट्ज़रलैंड, भारत, पोलैंड, पुर्तगाल, जापान और संयुक्त राज्य अमेरिका से हैं। भारत के छह जीनोम नमूनों में भिन्नता पाई गई है, जिसमें ब्रिटेन में सबसे अधिक मामले (36) हैं।

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राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला (सीएसआईआर-एनसीएल) अब डेल्टा प्लस वेरिएशन की मौजूदगी का निर्धारण करने के लिए रत्नागिरी और सिंधुदुर्ग के नमूनों का अध्ययन कर रही है। इन दो क्षेत्रों में विशेष रूप से भारत में सक्रिय संक्रमणों का अनुपात सबसे अधिक है।

असर और इलाज

विशेषज्ञ वर्तमान में यह पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं कि यह नोवेल वेरिएशन बीमारी के विकास को कैसे प्रभावित करता है और क्या यह गंभीर COVID-19 संक्रमण का कारण बनती है। हालांकि, प्रारंभिक निष्कर्ष बताते हैं कि यह नोवेल वेरिएशन COVID-19 के लिए मोनोक्लोनल एंटीबॉडी कॉकटेल इलाज (MAC) के लिए प्रतिरोधी हो सकती है। MAC थेरेपी जिसे हाल ही में भारत में मंजूरी दी गई है, में दो दवाओं का संयोजन होता है, जिनका नाम कैसिरिविमैब और इमडेविमैब है।

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इस संबंध में किए गए कुछ दावों का मतलब है कि नई किस्म कोरोना वायरस की इम्यून प्रतिक्रिया से बचने में सक्षम हो सकती है, लेकिन उस नतीजे को निकालने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं। इसके अलावा, विशेषज्ञ डेल्टा प्लस की कई अन्य विशेषताओं को समझने के लिए काम कर रहे हैं, जिसमें ट्रांसमिशन, संक्रामकता और टीकाकरण के प्रतिरोध शामिल हैं।

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अमित कुमार बाजपेयी
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