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Thalassaemia Treatment: मिल गई थैलेसीमिया की दवाई! अब बिना खून चढ़ाए ठीक होगी बीमारी, FDA ने दी पहली ओरल पिल को मंजूरी

Thalassaemia Treatment: अमेरिकी FDA विभाग ने 'मितापीवाट' (Aqvesme) नामक दवा को मंजूरी दे दी है। मुंह से ली जाने वाली इस दवा से थैलेसीमिया को बिना किसी ब्लड ट्रांसफ्यूजन के ही ठीक किया जा सकता है। आइए जानते हैं कि भारत को थैलेसीमिया की राजधानी क्यों कहा जाता है, इसके लक्षण क्या होते हैं और इससे बचने के लिए कौन-कौन से उपाय अपनाने चाहिए।

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भारत

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Nidhi Yadav

Jan 02, 2026

Thalassaemia Treatment

Thalassaemia Treatment (image- gemini AI)

Thalassaemia Treatment: भारत को थैलेसीमिया के मामले में विश्व की राजधानी कहा जाता है क्योंकि भारत में इस बीमारी के सबसे ज्यादा मरीज हैं। थैलेसीमिया असल में एक आनुवंशिक रोग होता है। इसमें हमारे रक्त में हीमोग्लोबिन की कमी हो जाती है। थैलेसीमिया और एनीमिया के लक्षण लगभग समान होते हैं लेकिन ये दोनों बीमारियां अलग-अलग होती हैं। एनीमिया पोषक तत्वों में आयरन की कमी से होने वाला रोग होता है, जबकि थैलेसीमिया हीमोग्लोबिन प्रोटीन की कमी से होता है। थैलेसीमिया के मरीजों को जीवित रहने के लिए लगभग हर महीने ब्लड ट्रांसफ्यूजन जैसी दर्दनाक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।

थैलेसीमिया के मरीजों के लिए अब एक नई खुशखबरी आ चुकी है। अमेरिकी FDA द्वारा मंजूर की गई 'मितापीवाट' (Aqvesme) नामक दवा को मंजूरी मिल चुकी है। यह दुनिया की पहली ऐसी मुंह से ली जाने वाली दवा है जिसे मरीज एक गोली की तरह लेकर थैलेसीमिया से मुक्त हो सकता है। अब मरीजों को ब्लड ट्रांसफ्यूजन के दर्द से नहीं गुजरना पड़ेगा। आइए जानते हैं इसके बारे में विस्तार से।

भारत: थैलेसीमिया में विश्व की राजधानी!

भारत में थैलेसीमिया के लगभग 1,50,000 मरीज हैं और हर साल लगभग 10 हजार से 12 हजार बच्चे थैलेसीमिया के साथ पैदा होते हैं। विश्व में थैलेसीमिया के जितने कुल मरीज हैं, उनमें से हर आठवां मरीज भारत में रहता है। भारत में मरीजों की इतनी बड़ी संख्या होने के कारण ही इसे थैलेसीमिया के मामले में विश्व की राजधानी कहा जाता है। थैलेसीमिया को दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत अक्षमता (डिसएबिलिटी) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। अब इसकी ओरल पिल भारत में आने के बाद यहाँ से भी थैलेसीमिया का खतरा कम किया जा सकता है।

थैलेसीमिया के लक्षण क्या होते हैं?(Thalassaemia Symptoms)

  • थैलेसीमिया के लक्षण आमतौर पर 6 से 12 महीने के अंदर दिखना शुरू होते हैं।
  • बहुत ज्यादा थकान और कमजोरी महसूस होती है।
  • त्वचा का पीला पड़ जाना।
  • बच्चों का वजन और लम्बाई उम्र के हिसाब से कम होना।
  • इम्युनिटी कम होने के कारण जल्दी-जल्दी बीमार पड़ जाना।

थैलेसीमिया से बचने के उपाय(Thalassaemia Prevention)

  • गर्भावस्था के 10वें से 15वें हफ्ते के बीच 'प्रीनेटल डायग्नोसिस' (Prenatal Diagnosis) टेस्ट करवाना चाहिए।
  • विटामिन-B (फोलिक एसिड) युक्त आहार का सेवन करना चाहिए।
  • अपने बच्चे को इससे बचाने के लिए संतुलित आहार का प्रयोग करें।

डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल रोगों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूकता लाना है। यह किसी क्वालिफाइड मेडिकल ओपिनियन का विकल्प नहीं है। इसलिए पाठकों को सलाह दी जाती है कि वे कोई भी दवा, उपचार या नुस्खे को अपनी मर्जी से न आजमाएं, बल्कि इस बारे में संबंधित एक्सपर्ट या डॉक्टर की सलाह जरूर ले लें।