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स्टेरॉयड लेने वाले को टीबी का खतरा अधिक

विश्व क्षय रोग दिवस-24 मार्च15 लाख लोगों की मृत्यु हर वर्ष टीबी से होती है 30 फीसदी मरीज विश्व के केवल भारत में हैं10 सेकंड में एक व्यक्ति की मृत्यु टीबी से

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स्टेरॉयड लेने वाले को टीबी का खतरा अधिक

स्टेरॉयड लेने वाले को टीबी का खतरा अधिक

कुछ युवा बॉडी बिल्डिंग के लिए स्टेरॉयड लेते हैं। इससे शरीर की इम्युनिटी घटती है और टीबी (क्षय रोग) होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। एक बार टीबी होने से ऐसे लोगों पर टीबी की दवा का असर कम होता है।
क्या है टीबी
टीबी बैक्टीरिया से होने वाली बीमारी है। बैक्टीरिया हवा से एक से दूसरे में फैलते हैं। छींकने से मुंह-नाक से निकली छोटी बूंदों से भी संक्रमण होता है। टीबी फेफड़ों दिमाग, यूटरस, मुंह, लिवर, किडनी, गला, हड्डी आदि में भी होता है।
प्रमुख लक्षण
दो सप्ताह से खांसी, खांसी में बलगम या खून आना, वजन घटना, भूख कम लगना, सांस उखडऩा, शाम या रात में बुखार, सर्दी में पसीना आना, सांस लेने पर सीने में दर्द होता है। कैंसर या ब्रॉन्काइटिस होने पर सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज और मुंह से खून भी आता है।
कैसे नुकसान होता
टीबी सेल्स को नुकसान पहुंचाता है। फेफड़ों से शुरू होकर कैंसर तक हो जाता है। गर्भाशय में होने से बांझपन, दिमाग में होने पर मिर्गी जैसे दौरे आना, लिवर में है पेट में पानी भरना और हड्डियों के टीबी में हड्डियां तक गल जाती हैं।
किन्हें खतरा
जिनकी इम्युनिटी खराब, अंधेरी और सीलन भरी जगहों पर रहने वाले या पास में किसी को टीबी है। डायबीटीज रोगी, स्टेरॉयड लेने वाले युवा और एचआइवी पीडि़तों में संक्रमण की आशंका अधिक रहती है।
जांचें
सभी सरकारी अस्पतालों में जांच मुफ्त होती है। इसमें एक्सरे और बलगम की जांच होती है। अगर किडनी में टीबी है तो यूरिन कल्चर टैस्ट, यूटरस में है तो सर्वाइकल स्वैब या सीटी स्कैन और हड्डियों में है तो एमआरआइ टैस्ट कराते।
इलाज
सामान्य टीबी का इलाज छह माह तक चलता है। बीच में इलाज छोडऩे बैक्टीरिया के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती, जिसे डीआर टीबी कहते हैं। इसमें इलाज एक साल से अधिक भी चलता है। लापरवाही न करें।
प्रोटीन डाइट से बचाव
इम्युनिटी बढ़ाने के लिए प्रोटीन डाइट (सोयाबीन, दालें, अंडा, पनीर आदि) लें। भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचें। कम रोशनी वाली और गंदी जगहों पर न रहें। टीबी के मरीज से दूरी बनाकर रहें। हवादार घरों में रहें। छींकते और थूकते समय सावधानी बरतें। कोई भी दवा अपने मन से न लें।
बच्चों पर असर
बच्चों में टीबी होने पर संपूर्ण विकास प्रभावित होता है। इसका असर दिमाग पर ज्यादा होता है। इसे मैनिनजाइटिस कहते हैं। इसके लिए जन्म के समय टीका लगता है। टीकाकरण जरूर करवाएं।
गर्भवती
गर्भवती या बच्चे को दूध पीला रही महिलाएं भी टीबी की दवा ले सकती हैं। इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता है। डॉक्टरी सलाह पर टीबी की दवा नियमित लेते हैं। बच्चे में संक्रमण न हो इसलिए दूध पिलाते समय मां अपना मुंह ढंक कर रखे।
टीबी से जुड़े भ्रम
यह आनुवांशिक बीमारी नहीं है जो एक से दूसरी पीढ़ी में फैलती है। छूने से नहीं फैलती है। ऐसा नहीं है कि यह केवल धूम्रपान करने वाले लोगों में ही में होती या केवल गरीबों को ही होती है। किसी को भी हो सकती है। यह जानलेवा बीमारी नहीं है। इसका कागर इलाज है।
डॉ. विनोद कुमार गर्ग, राज्य क्षय रोग अधिकारी, राजस्थान