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87 साल की वृद्धा कुछ इस तरह उठा रही हैं परिवार की जिम्मेदारी, कहानी जान आंसूओं को रोककर रखना होगा मुश्किल

रीब 15 साल तक उनका बेटा बेड पर पड़ा रहा और 42 वर्ष की उम्र में उसका भी देहान्त हो गया।

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Arijita Sen

Jan 24, 2019

Shila Ghosh

87 साल की वृद्धा कुछ इस तरह उठा रही हैं परिवार की जिम्मेदारी, कहानी जान आंसूओं को रोककर रखना होगा मुश्किल

नई दिल्ली। इंसान की जिंदगी में सबसे अहम स्थान उसका आत्मसम्मान रखता है। अगर व्यक्ति को अपनी आत्मसम्मान की फिक्र नहीं है तो समाज में लोग भी उसका सम्मान नहीं करते हैं। बात जब हम आत्मसम्मान या सेल्फ रेस्पेक्ट की कर रहे हैं तो शीला घोष का नाम आना लाजिमी है। अब आप सोच रहे होंगे कि यह शीला घोष कौन है? इनके बारे में पूरी बात जानने के बाद शायद जिंदगी के प्रति आपका भी नजरिया बदल जाए, शायद इन्हें देखकर खुद के इंसान पर गर्व महसूस हो। आइए जानते हैं शीला घोष और उनकी जिंदगी के बारे में।

87 साल की एक बुजुर्ग महिला है शीला घोष। उनके पति,बेटा, एक बेटी सब परिवार छोड़ कर चले गए हैं। घर में एक बहू, एक मेंटल डिसेबल्ड बेटी और एक पोते के अलावा और कोई नहीं है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इन सभी की जिम्मेदारी इस वृद्ध महिला के कंधे पर है। हालांकि हमारे लिए भले ही यह आश्चर्य की बात है, लेकिन 87 साल की इस बुजुर्ग महिला के चेहरे पर एक भी शिकन नहीं है, अपनी जिम्मेदारी को हंसते खेलते ये आज भी पूरा कर रही हैं।

प्रारंभिक जीवन

शीला का जन्म एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। महज 14 साल की उम्र में ही उनके माता-पिता ने उनकी शादी करा दी थी। शीला बचपन में बाकी बच्चों की तरह ही बेहद शरारती थीं, लेकिन ससुराल में जाते ही उन पर बंदिशों का पहाड़ टूट गया। ससुराल का माहौल इस हद तक सख्त था कि खिड़की से बाहर झांकने की इजाजत भी बहू को नहीं थी। पति रेलवे में होने की वजह से उनका एक स्थान से दूसरे स्थान को तबादला होता रहता था। इसी बहाने शीला को घूमने का भरपूर मौका मिलता था, लेकिन किस्मत को यह मंजूर नहीं था। पति की मौत हो गई और उनकी खुशियों पर रोक लग गई।

शीला को बेटी और बेटे में फर्क करना पसंद नहीं था। वह चाहती थीं कि सभी को समान रूप से शिक्षा मिलें। यहां भी किस्मत ने उनका साथ छोड़ा और कुछ दिनों के अंदर उनकी बड़ी बेटी का निधन हो गया। एक बेटी की दिमागी हालत ठीक न होने की वजह से शीला ने अपने बेटे की शिक्षा पर पूरा ध्यान दिया।

बेटा पढ़ लिख कर रेलवे में नौकरी करने लगा, लेकिन तभी फेफड़े में कैंसर हो जाने की वजह से उनका 30 साल का नौजवान बेटा काम करने में असमर्थ हो गया और सीधे बेड पर आ गया। इसी बीच उसका वेतन भी रोक दिया गया। करीब 15 साल तक उनका बेटा बेड पर पड़ा रहा और 42 वर्ष की उम्र में उसका भी देहान्त हो गया।

घर में पैसों की कमीं और ऊपर से ये सबकुछ, शीला के लिए इतना कुछ संभालना संभव नहीं था, लेकिन उन्होंने खुद को टूटने नहीं दिया।

घर चलाने के लिए पहले शीला ने अपनी बहू के साथ मिलकर मोमबत्तियां बनाकर उन्हें बेचना शुरू किया, लेकिन मोम बड़ा मंहगा पड़ता था।

फिर इस बीच उनके पोते ने उन्हें भाजा तलकर बेचने का आइडिया दिया। शीला को यह बात बहुत पसंद आई और तब से आज तक वह यह काम करती आ रही हैं।

शीला की जिंदादिली

शीला ने गरीबी के चलते कभी भीख का सहारा नहीं लिया और न ही किसी के सामने हाथ फैलाएं बल्कि उन्होंने कोलकाता में बंगाली भाजा बेचने का काम शुरू कर दिया। आपको जानकर हैरानी होगी कि जहां शीला का दुकान है वह जगह उनके घर से करीब दो घंटे की दूरी पर है जहां पहुंचने के लिए वह रोजाना लोकल ट्रेन से अप डाउन करती हैं। हावड़ा के पास बाली नामक जगह में रहने वाली शीला हर रोज सामानों को साथ लेकर ट्रैवल करती हैं।

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हर रोज अपने साथ सामान बेचने की सामग्री, टोकरी इत्यादि को लेकर सफर करना उनके लिए मुश्किल होने के बावजूद वह किसी से कोई शिकायत नहीं करती। भाजा बनाते बनाते इनके हाथ नहीं थकते। आखिर उन पर परिवार की जिम्मेदारी जो है। शीला दिनभर में भाजा बेचकर करीबन 1200 रुपए तक कमा लेती हैं, हालांकि यह भी चार लोगों के लिए कम पड़ता है, लेकिन किसी से मांगना उन्हें सख्त नापसंद है।

शीला का कहना है कि जब तक जिंदा हैं तब तक भीख नहीं मांगेगी। लोग उनकी बहुत इज्जत करते हैं। उनकी भाजा के साथ साथ लोग उनके जज्बे के भी कायल हैं, वाकई में जिंदगी जीना कोई उनसे सीखें!