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मुट्ठी भर बाजरे के चक्कर में शेर शाह सूरी के हाथ से नकलने वाली थी दिल्ली की गद्दी, जानें यह दिलचस्प दास्तां

22 मई 1545 को हुई थी शेर शाह सूरी की मौत सुमेल की लड़ाई में दिल्ली की गद्दी लगभग हार गया था शेर शाह जानें फिर क्या हुआ

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battle of giri sumel when sher shah suri almost lost his kingdom

मुट्ठी भर बाजरे के चक्कर में शेर शाह सूरी के हाथ से नकलने वाली थी दिल्ली की गद्दी, जानें यह दिलचस्प दास्तां

नई दिल्ली। इतिहासकारों की मानें तो शेर शाह सूरी सन 1472 में जन्मा और 22 मई 1545 को उसकी मृत्यु हो गई। तारीख-ए-शेरशाही में एक जगह ज़िक्र है कि फरीद खान यानी शेर शाह सूरी ( sher shah suri ) ने अपनी सौतेली मां के कहने पर जागीरदारी छोड़ दी थी। शेर शाह सूरी इतिहास के पन्नों में दर्ज वह नाम है, जिसे उसकी वीरता, अदम्य साहस और परिश्रम के बल पर दिल्ली के सिंहासन पर क़ब्ज़ा करने के लिए जाना जाता है। यूं तो शेर शाह के कई किस्से हैं जो उसके व्यक्तित्व पर रोशनी डालते हैं। आज हम उसकी ज़िंदगी से जुड़ा एक ऐसा किस्सा लेकर आए हैं जो बेहद दिलचस्प है।

सुमेल की लड़ाई में राजा मालदेव पहुंच गए थे दिल्ली के करीब

सुमेल की लड़ाई, जो राजपूतों और शेर शाह सूरी के बीच हुई थी, जो इस बात की गवाह है कि राजपूत कितने बहादुर होते हैं। जब खानवा की लड़ाई में राणा सांगा बाबर से हार कर अपना वैभव खो बैठे थे। उसी समय शेर शाह राजपूताना पर कब्ज़ा करने के लिए आगे बढ़ा। उसके सामने जोधपुर के राजा मालदेव युद्ध में उसके सामने थे। मालदेव ने नागौर, अजमेर, बीकानेर, मेड़ता जैतारण और टोंक को अपनी सीमा में मिला लिया था। मालदेव अपनी सीमाओं को बढ़ाते ही चल रहे थे। इन सब जगहों के साथ अब उन्होंने झज्जर को भी मिला लिया था। मालदेव अब दिल्ली से केवल 30 मील ही दूर थे।

हार के बेहद करीब था शेर शाह सूरी

दिल्ली के इतनी करीब आने के बाद मालदेव और शेर शाह में युद्ध ज़रूरी हो गया था। दोनों के बीच यह युद्ध 4 जनवरी 1544 में राजस्थान में पाली के जैतारण में लड़ा गया। मालदेव के पराक्रम से शेर शाह अपनी हार के बेहद करीब आ गया था। लड़ते-लड़ते रात हो गई थी। तभी कुछ ऐसा हुआ कि मालदेव अपनी सेना पर अविश्वास कर रात के अंधेरे में वहां से चले गए।

कुछ ही समय में मुड़ गया जंग का रुख

इतिहासकारों की मानें तो उस रात रणभूमि में अभी भी रणबांकुरों ने महावीर राव खीवकरण, राव जैता, राव कुंपा, राव पांचायण और राव अखेराज के नेतृत्व में मारवाड़ के मात्र 20 हजार सैनिक मौजूद थे। राजपूतों के 20 हज़ार सैनिकों ने शेर शाह सूरी के 80 हज़ार सैनिकों के 'छक्के छुड़ा' दिए थे। राजपूतों के 20 हज़ार सैनिकों ने दिल्ली पर ऐसा हमला बोला कि दिल्ली की गद्दी हिल गई। पूरी दिल्ली में हाहाकार मच गया था। हमला इतना भयंकर था कि शेर शाह सूरी ने मैदान छोड़ने का फैसला कर लिया था। जंग रुकने ही वाली थी तभी शेर शाह के सेनापति खवास खान मारवात ने राव जैता और राव कुंपा को मारकर जंग का रुख अपनी तरह कर लिया। जंग में इतनी तबाही हुई थी शेर शाह ने कहा- "खैर करो, वरना मुट्ठी भर बाजरे के लिए मैं अपनी दिल्ली की सल्तनत खो देता।"