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परदेश में परचम: कर्नाटक की धरती पर पांच दशक से अधिक समय से समाजसेवा और नि:शुल्क आयुर्वेद सेवा का अलख जगा रहे हैं 82 वर्षीय घीसूलाल कटारिया

राजस्थान के पाली जिले के राणावास गांव में जन्मे घीसूलाल कटारिया उन प्रवासी राजस्थानी विभूतियों में शामिल हैं, जिन्होंने परदेश में रहते हुए भी अपनी संस्कृति, संस्कार और सेवा भाव को कभी नहीं छोड़ा। वर्तमान में हुब्बल्ली निवासी 82 वर्षीय कटारिया आज भी उसी ऊर्जा और समर्पण के साथ समाजसेवा में जुटे हैं, जो युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने हुब्बल्ली में प्राप्त की। पहले गुजराती माध्यम और बाद में मराठी माध्यम से अध्ययन करने के कारण उन्होंने भाषाओं पर अद्भुत पकड़ बनाई। आज वे गुजराती, मराठी, कन्नड़, हिंदी, राजस्थानी और अंग्रेजी सहित करीब छह भाषाओं का ज्ञान रखते हैं। यही बहुभाषी व्यक्तित्व उन्हें विभिन्न समाजों और संस्कृतियों के बीच एक मजबूत सेतु बनाता है।

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घीसूलाल कटारिया

घीसूलाल कटारिया

विभिन्न संस्थाओं में सक्रियता
धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र में उनका योगदान भी उल्लेखनीय रहा है। वे वर्ष 2002 से 2005 तक श्री वर्धमान स्थानकवासी समाज, हुब्बल्ली के अध्यक्ष रहे। इस दौरान उन्होंने मासखमण सहित 4 चौविहार अटाई जैसी कठिन धार्मिक साधनाएं भी कीं, जो उनके आध्यात्मिक जीवन की गहराई को दर्शाती हैं। समाजसेवा के क्षेत्र में भी उनका सफर प्रेरणादायक रहा है। वे वर्ष 1979 में विवेकानंद अस्पताल, हुब्बल्ली के उपाध्यक्ष रहे तथा लायंस क्लब ऑफ हुब्बल्ली के सक्रिय सदस्य भी रहे। दो वर्ष पूर्व उनके 80वें जन्मदिवस पर लायंस क्लब ने उनके सामाजिक योगदान के लिए विशेष सम्मान प्रदान किया।

जनकल्याण कार्यों में निरंतर सहयोग
कटारिया पांच वर्षों तक सिद्धारूढ़ स्वामी मठ ट्रस्ट के उपाध्यक्ष भी रहे। मठ परिसर में उन्होंने अपने निजी खर्च से एक प्याऊ का निर्माण करवाया। इसके अलावा विभिन्न जगहों पर मंदिर निर्माण, शिक्षा, स्वास्थ्य, गौसेवा और अन्य जनकल्याण कार्यों में वे निरंतर सहयोग करते रहे हैं। वे मरुधर जैन संघ के ट्रस्टी भी रह चुके हैं और हुब्बल्ली में हिंदी स्कूल के संचालन एवं विकास में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

नि:स्वार्थ आयुर्वेद सेवा
उनकी सबसे बड़ी पहचान उनकी नि:स्वार्थ आयुर्वेद सेवा है। पिछले पांच दशक से अधिक समय से वे लोगों का आयुर्वेदिक उपचार कर रहे हैं और न केवल परामर्श, बल्कि आयुर्वेदिक दवाइयां भी नि:शुल्क उपलब्ध कराते हैं। उनका मानना है कि समाजसेवा किसी प्रसिद्धि के लिए नहीं, बल्कि मन की संतुष्टि के लिए होनी चाहिए।

समाजहित के कार्यों से नई पहचान
उनके पिता हीराचंद कटारिया राजस्थान से हुब्बल्ली आए थे और यहां कपड़े के व्यवसाय की शुरुआत की थी। परिवार की उसी कर्मभूमि को घीसूलाल कटारिया ने सेवा, संस्कार और समाजहित के कार्यों से नई पहचान दी। आज 82 वर्ष की आयु में भी उनकी सक्रियता, सरलता और सेवा भावना यह संदेश देती है कि सच्चा जीवन वही है, जो दूसरों के काम आए। अनेक सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित घीसूलाल कटारिया वास्तव में परदेश में राजस्थानी समाज का गौरव और नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा हैं।