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मोबाइल की दुनिया में संस्कारों की डोर थामना जरूरी: साध्वी इन्दुप्रभा

चातुर्मास के लिए हुब्बल्ली में विराजित साध्वी इन्दुप्रभा ने कहा कि आज की तेज रफ्तार जिंदगी में बच्चों और युवा पीढ़ी को धर्म, संस्कार और गुरु परंपरा से जोडऩा समय की सबसे बड़ी जरूरत है। मोबाइल और डिजिटल दुनिया के बढ़ते प्रभाव के बीच परिवार, गुरु और धर्म से दूरी बढ़ रही है। ऐसे में बचपन से ही बच्चों में धार्मिक संस्कारों का बीजारोपण किया जाना चाहिए। राजस्थान पत्रिका से विशेष बातचीत में उन्होंने बच्चों को धर्म से जोडऩे, मोबाइल के बढ़ते प्रभाव, संयुक्त परिवार की उपयोगिता, युवाओं को गुरु चरणों से जोडऩे तथा धार्मिक गतिविधियों के माध्यम से समाज में एकता और संस्कार मजबूत करने जैसे विभिन्न विषयों पर विचार व्यक्त किए।
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साध्वी इन्दुप्रभा आदि ठाणा-5

साध्वी इन्दुप्रभा आदि ठाणा-5

'गुड लकÓ से बच्चों में धर्म के प्रति रुचि
साध्वी इन्दुप्रभा ने बताया कि बच्चों को धर्म से जोडऩे के उद्देश्य से 'गुड लकÓ कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इसके माध्यम से छोटे बच्चों को गुरु दर्शन, गुरु वंदन और सामायिक जैसी धार्मिक गतिविधियों की जानकारी दी जाती है। उनका उद्देश्य बच्चों में धर्म के प्रति रुचि पैदा करना और उन्हें भारतीय संस्कृति एवं संस्कारों से जोडऩा है। उन्होंने कहा कि बच्चों के लिए धार्मिक पाठशाला का भी संचालन किया जा रहा है। प्रत्येक रविवार को शिविर आयोजित कर बच्चों को धार्मिक ज्ञान के साथ संस्कारों की शिक्षा दी जाती है। बचपन में दिए गए संस्कार जीवनभर व्यक्ति का मार्गदर्शन करते हैं।

नवकार मंत्र से दिन की शुरुआत
साध्वी ने बताया कि बच्चों को प्रतिदिन नवकार मंत्र का जाप कराया जा रहा है। नवकार मंत्र के नियमित जाप से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक भाव विकसित होते हैं। धार्मिक शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित न रहकर व्यवहार और जीवनशैली का हिस्सा बने, यही प्रयास किया जा रहा है।

मोबाइल ने घटाया परिवार का संवाद
मोबाइल के बढ़ते उपयोग पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि बच्चों के धार्मिक गतिविधियों से दूर होने का एक प्रमुख कारण मोबाइल भी है। मोबाइल के अत्यधिक इस्तेमाल से बच्चों में परिवार के प्रति आत्मीय संवाद और संस्कारों में कमी देखने को मिल रही है। उन्होंने कहा कि पहले परिवार के सदस्य साथ बैठकर बातचीत करते थे, लेकिन आज मोबाइल ने उस संवाद की जगह ले ली है। इसका असर बच्चों के व्यवहार और पारिवारिक संबंधों पर भी पड़ रहा है। मोबाइल के कारण युवा पीढ़ी गुरु चरणों और धार्मिक वातावरण से भी दूर होती जा रही है।

'संगठन में ही शक्तिÓ, संयुक्त परिवार जरूरी
साध्वी इन्दुप्रभा ने कहा कि वर्तमान समय में संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवार बढ़ते जा रहे हैं। इससे बच्चों और युवाओं में स्वच्छंदता तथा स्वतंत्रता की भावना अधिक बढ़ रही है। संयुक्त परिवार केवल साथ रहने की व्यवस्था नहीं, बल्कि संस्कारों की पाठशाला भी है। उन्होंने कहा कि 'संगठन में ही शक्ति है।Ó परिवार के बड़े-बुजुर्गों का साथ बच्चों को अनुभव, संस्कार और जीवन-मूल्यों की सीख देता है। इसलिए संयुक्त परिवार की भावना को मजबूत करना समाज के लिए आवश्यक है।

धार्मिक क्रिकेट से खेल और संस्कार का संगम
धर्म को युवाओं और समाज के विभिन्न वर्गों से जोडऩे के लिए धार्मिक गतिविधियों को नए स्वरूप में भी आयोजित किया जा रहा है। साध्वी ने बताया कि हर महीने धार्मिक क्रिकेट प्रतियोगिता आयोजित की जा रही है। इसमें युवा, महिलाएं, बड़े और बच्चे सभी उत्साह के साथ भाग लेंगे। प्रतियोगिता के दौरान धार्मिक प्रश्न पूछे जाएंगे। इस तरह नई पीढ़ी में धार्मिक ज्ञान एवं संस्कार विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है। प्रतियोगिता के अंत में फाइनल मैच भी आयोजित होगा।

पर्युषण पर्व में होंगे विशेष आयोजन
साध्वी इन्दुप्रभा ने बताया कि इस बार पर्युषण पर्व के दौरान विशेष धार्मिक आयोजन किए जाएंगे। पर्व के माध्यम से आत्मचिंतन, संयम, तप, क्षमा और सद्भाव जैसे जीवन-मूल्यों को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास रहेगा। उन्होंने कहा कि पर्युषण केवल धार्मिक अनुष्ठानों का पर्व नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर झांकने और जीवन को बेहतर बनाने का अवसर है। समाज के सभी वर्गों को इसमें सक्रिय भागीदारी करनी चाहिए।

'बच्चों को धर्म से जोडऩा ही भविष्य की सबसे बड़ी पूंजीÓ
साध्वी इन्दुप्रभा ने कहा कि बच्चों को केवल आधुनिक शिक्षा देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें संस्कार, धर्म, परिवार और गुरु परंपरा से जोडऩा भी उतना ही आवश्यक है। यदि बचपन में धर्म और संस्कारों की मजबूत नींव रखी जाए तो बच्चे आगे चलकर समाज और परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे। उन्होंने अभिभावकों से आह्वान किया कि वे बच्चों को समय, संस्कार और संवाद भी दें। परिवार में धार्मिक वातावरण बने, बच्चे गुरुजनों के संपर्क में रहें और नियमित रूप से धार्मिक गतिविधियों में भाग लें—यही संस्कारवान समाज की आधारशिला बनेगा।

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