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राजस्थान से कर्नाटक तक गूंज रही मारवाड़ी भजनों की मिठास, श्रावण-भाद्रवा में रोज शाम जुटती हैं राजस्थान मूल की महिलाएं

राजस्थान से दूर कर्नाटक की धरती पर रहने के बावजूद अपनी मातृभूमि की संस्कृति, भाषा और भक्ति परंपरा को जीवंत रखने का अनूठा प्रयास हुब्बल्ली (कर्नाटक) की राजस्थान मूल की महिलाओं की महिला भजन मंडली कर रही है। राजेश्वर भगवान के मंदिर परिसर में महिलाओं की यह मंडली पिछले करीब चार वर्षों से नियमित रूप से मारवाड़ी भजनों की प्रस्तुति दे रही है। भजनों के माध्यम से यहां राजस्थान की लोक संस्कृति और भक्ति की मिठास भी सुनाई देती है।
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हुब्बल्ली के राजेश्वर भगवान मंदिर परिसर में मारवाड़ी भजनों की प्रस्तुति देती राजस्थान मूल की महिला भजन मंडली। महिलाएं स्वयं ढोलक, जंजीरा व अन्य वाद्य यंत्र बजाकर भजनों के जरिए राजस्थान की लोकभक्ति और संस्कृति को जीवंत रख रही हैं।

हुब्बल्ली के राजेश्वर भगवान मंदिर परिसर में मारवाड़ी भजनों की प्रस्तुति देती राजस्थान मूल की महिला भजन मंडली। महिलाएं स्वयं ढोलक, जंजीरा व अन्य वाद्य यंत्र बजाकर भजनों के जरिए राजस्थान की लोकभक्ति और संस्कृति को जीवंत रख रही हैं।

परंपरा से नई पीढ़ी तक पहुंच रही संस्कृति
कर्नाटक में वर्षों से रह रही इन महिलाओं के लिए मारवाड़ी भजन केवल पूजा-पाठ का माध्यम नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने का जरिया भी हैं। राजस्थान की मिट्टी से दूर होने के बावजूद उनके सुरों में आज भी वही लोकभाव, बोली और भक्ति सुनाई देती है। राजेश्वर भगवान मंदिर परिसर में गूंजते ये भजन प्रवासी राजस्थानियों को अपनी संस्कृति से जोडऩे के साथ आने वाली पीढ़ी तक अपनी परंपराओं को पहुंचाने का भी काम कर रहे हैं। हर ग्यारस, अमावस्या और पूर्णिमा के अवसर पर भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है। वहीं श्रावण और भाद्रवा के दो महीनों में प्रतिदिन शाम 5 से 7 बजे तक महिलाएं सामूहिक रूप से भजन-कीर्तन करती हैं। इस दौरान मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण से सराबोर हो जाता है।

ढोलक और जंजीरा भी महिलाएं खुद बजाती हैं
इस भजन मंडली की खासियत यह है कि महिलाएं केवल भजन गाती ही नहीं, बल्कि ढोलक, जंजीरा सहित अन्य वाद्य यंत्र भी स्वयं बजाती हैं। सामूहिक गायन के साथ वाद्य यंत्रों की संगत भजनों को और अधिक प्रभावी बना देती है। मंडली में गजानन, माताजी, कृष्ण भगवान, महादेव, रामजी सहित विभिन्न देवी-देवताओं के मारवाड़ी भजन प्रमुखता से गाए जाते हैं। मैं थानैं सिवरूं गजानन…, पैदल चलता-चलता जय बोले…, तेरा पर्वत ऊपर डेरा शंकर भगवान…, वैगा-वैगा आइजो माताजी म्हारे आंगणिये… जैसे भजन नियमित रूप से गूंजते हैं।

भजन के बहाने जुड़ रहा समाज
इस मंडली से आसपास रहने वाली राजस्थान मूल की महिलाएं जुड़ी हुई हैं। प्रेमलता सीरवी, हंजा पटेल, गीता पटेल, गीगी बाई पटेल, धापी देवी पटेल, काजू पटेल, शारदा देवी पटेल, हरिया पटेल समेत कई महिलाएं नियमित रूप से भजन-कीर्तन में शामिल होती हैं। राजस्थान मूल की प्रेमलता सीरवी ने बताया कि आसपास रहने वाली महिलाएं भजन मंडली में शामिल होती हैं। सभी वाद्य यंत्र महिलाएं स्वयं बजाती हैं। भजन-कीर्तन के माध्यम से न केवल भगवान की आराधना होती है, बल्कि महिलाओं के बीच आपसी प्रेम, अपनापन और सौहार्द भी बढ़ता है।