
जैन धर्म में चातुर्मास का महत्व विषय पर आयोजित राजस्थान पत्रिका परिचर्चा में अपनी बात रखतीं महिलाएं।
जैन धर्म में चातुर्मास की परम्परा अत्यंत प्राचीन है। चातुर्मास में महापर्व सम्वत्सरी भी आता है। इस दृष्टि से इसकी महत्ता और भी बढ़ जाती है। यह जैनों का अलौकिक पर्व है। एक ओर जहां यह तप, त्याग का पर्व है वहां परस्पर वैमनस्य और वैर, विरोध को दूर करने का सशक्त माध्यम भी है। जैन धर्म में चातुर्मास का महत्व विषय पर आयोजित राजस्थान पत्रिका परिचर्चा में महिलाओं ने कहा कि भगवान महावीर ने चातुर्मास में इसकी गवेषणा इसलिए की थी कि व्यक्ति समाज में रहते अनेक प्रकार के मन-मुटावों का शिकार हो सकता है। इसलिए महापर्व सम्वत्सरी में इनका सुधार कर लिया जाए। यह धारणा एक स्वस्थ और सभ्य समाज की गारंटी है। इस प्रकार जैन धर्म में चातुर्मास का सामाजिक और धार्मिक महत्व तो है ही, व्यक्ति और समाज को एक सूत्र में पिरोने का भागीरथ प्रयत्न भी है। साधु-साध्वियां वर्षावास में लोगों को समाज में परस्पर भाईचारे, सद्भावना और आत्मीयता बनाए रखने की प्रेरणा देते हैं।
आत्मा के कल्याण का अवसर
राजस्थान के चौराऊ निवासी ललिता मलाणी कहती हैं, हमारे धर्म ग्रंथों में चातुर्मास के दौरान कई नियमों का पालन करना जरूरी बताया गया है। चातुर्मास का समय भगवान के पूजन-आराधना और साधना का समय माना जाता है। इस समायवधि में अधिक से अधिक ध्यान धर्म-कर्म में देने की बात शास्त्रों में कही गई है। जैन संत-मुनि चातुर्मास के दौरान चार महीने तक एक ही स्थान पर रहते हैं, क्योंकि चातुर्मास के ये चार माह वर्षा ऋतु का समय होता है। इन दिनों तपस्वी, संत एक ही स्थान पर रहकर जप-तप करते है। चातुर्मास आत्मा के कल्याण करने का पर्व है। इस दौरान तप, धर्म, दान-पुण्य अधिक करते हैं। बड़ी-बड़ी तपस्या करने का पर्व है। अपनी आत्मा के कल्याण का अवसर मिलता है। साधु-साध्वियों के प्रवचन सुनने का सुनहरा अवसर हमें मिलता है।
धार्मिक मान्यताओं में महत्व
जालोर जिले के धूम्बडिय़ा निवासी कविता फोलामूथा कहती हैं, चातुर्मास पर्व का धार्मिक मान्यताओं में अलग ही महत्व है। जैन धर्म पूर्णत: अहिंसा पर आधारित है। इस धर्म में जीवों के प्रति शून्य हिंसा पर सबसे ज्यादा बल दिया जाता है। जैन धर्म के मतावलंबियों की मान्यता है कि वर्षा ऋतु में कई प्रकार के कीड़े व सूक्ष्म जीव सर्वाधिक सक्रिय हो जाते हैं। ये अमूमन आंखों से दिखाई नहीं देते। ऐसे में मनुष्य के बहुत अधिक चलने-उठने के कारण इन जीवों को नुकसान पहुंच सकता है। लिहाजा, इन जीवों को परेशानी नहीं हो और कम से कम हिंसा हो इसलिए चातुर्मास में चार महीने एक ही जगह रहकर धर्म कल्याण के कार्य किए जाते हैं। इस दौरान जैन साधु किसी एक जगह ठहरकर तप, प्रवचन तथा जिनवाणी के प्रचार-प्रसार को विशेष महत्व देते हैं।
जीवन सफल करने की मंगलकामना
जालोर निवासी खुशबू गांधीमूथा कहती हैं, जैन धर्म के संत, मुनि और अन्य विद्वतजन वर्ष भर पैदल चलकर भक्तों के बीच अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य का विशेष ज्ञान बांटते हैं। चातुर्मास में ही जैन धर्म का सबसे प्रमुख पर्व पर्युषण भी मनाया जाता है। मान्यता है कि जो जैन अनुयायी वर्ष भर जैन धर्म की विशेष मान्यताओं का पालन नहीं कर पाते वे इन आठ दिनों के पावन पर्व में रात्रि भोजन का त्याग करने से लेकर स्वाध्याय, जप-तप मांगलिक प्रवचनों का लाभ तथा साधु-संतों की सेवा में पूर्ण श्रद्धाभाव से संलिप्त रहकर अपना जीवन सफल करने की मंगलकामना कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त चार्तुमास में चार महीने तक एक ही स्थान पर रहकर ध्यान लगाने, प्रवचन देने आदि से कई युवाओं का मार्गदर्शन होता है।
खुद के समझने का मिलता है अवसर
जालोर निवासी प्रीति बोहरा कहती हैं, जैन धर्म में आमजनों को इन चार माह में संयमपूर्वक करने का उपदेश है। उक्त चार माह में किसी भी प्रकार से क्रोध नहीं करते हैं और संयम का पालन करते हैं। इन चार महीनों में व्यर्थ वार्तालाप, अनर्गल बातें, गुस्सा, ईष्र्या, अभिमान जैसे भावनात्मक विकारों से बचने की कोशिश की जाती है। जैन श्रमण परम्परा में चातुर्मास का अत्यन्त महत्व है। यह आध्यात्मिक जागृति का महापर्व है, जिसमें स्व परहित साधन का अच्छा अवसर प्राप्त होता है। यही कारण है कि वर्षवास को मुनिचर्या का अनिवार्य अंग और महत्वपूर्ण योग माना गया है। इसलिए इसे वर्षायोग अथवा चातुर्मास भी कहा जाता है। चातुर्मास खुद को समझने और अन्य प्राणियों को अभयदान देने का अवसर माना जाता है।
Published on:
16 Jun 2024 02:20 pm
बड़ी खबरें
View Allहुबली
कर्नाटक
ट्रेंडिंग
