
व्रत तप रूपी पेड का मूल है जिस पर मोक्ष नामक फल आता है
राणेबेन्नूर (हावेरी).
श्री सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर संघ की ओर से आयोजित शिविर में आचार्य महेन्द्र सागर सूरि ने अपने प्रवचन में कहा कि जिन शासन में तीन रत्न अत्यधिक महत्वपूर्ण है। सम्यज्ञान, सम्यग्दर्शन सम्यग्चरित्र और साथ ही सम्यन्लप भी। सबसे पहला है सम्यग्दर्शन, सम्यक्अर्थ है। सही वास्तविक यानि कि अच्छी सोच दर्शन यानी सभी बालों का सही अर्थ निकालना सही अर्थ सोचना। सम्यग्दर्शन का महत्व बहुत ही ज्यादा है। शासनपसि भगवान महावीर के भव सत्ताईस, पाश्र्वनाथ भगवान के भव दश नेमिनाथ भगवान के भव नव शांतिनाथ भगवान के भव बारत आदि नाथ भगवान के भव तेरह प्रत्येक जीव के भव अनंतानंत होने के बावजूद भी उनके भव सत्ताइस आदि ही कहलाए क्योंकि सम्यक्तव ऐसी प्रभावशाली चीज है कि उसकी प्राप्ति के बाद ही भवों की गिनती होती है। सम्यक्तव प्राप्त होने से पूर्व के जन्मों में राजा-महाराजा यहाँ तक कि चक्रवर्ती बने हो फिर भी उसके उन भवों की कोई कीमत नहीं होती। प्रभु महावीर के सत्ताइस भव के स्तवन में भी लिखा है कि समकित पाने के बाद के भवों की ही गिनती होती है। दीक्षा की क्रिया हे श्रावक के बारह व्रत उचरने की वृत्त लेने की क्रिया हो। चतुर्यव्रत लेने की क्रिया हो, वर्षी वर्षीतप आदि कोई भी तप आराधना-उपधान क्रिया में प्रवेश करना हो, पुद्गल वो हो- सिराने की क्रिया हो यानी किसी वस्तु को अपने से दूर करने की क्रिया हो प्रत्येक क्रिया के प्रारंभ में सबसे पहले सम्यक्तव उचराया जाता है। इससे यह सूचित होता है कि सर्वविरति यानी चारित्र जीवन आदि किसी भी साधना की नींव सम्यक्तव है। सम्यक्तव साधना-आराधना, व्रत तप रूपी पेड का मूल है जिस पर मोक्ष नामक फल आता है।
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Published on:
25 Oct 2023 06:50 pm
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