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50 साल से बना रहे जैविक गुड़, अब विदेशों से बंपर डिमांड, जानिए क्या है कीमत

-तिल्लौर गांव का गुड़ लोगों को खूब भा रहा-ठंड के सीजन में होती है ज्यादा खपत

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इंदौर/तिल्लौर। शहर से 30 किमी दूर स्थित तिल्लौर गांव में जैविक खेती कर गुड़ बनाया जाता है। यहां करीब 50 साल से गुड़ बनाने का कार्य किया जा रहा है। किसान ईश्वर यादव ने बताया कि हम गन्ने की खेती जैविक रूप से करते हैं। इसके लिए ना तो हम कोई दवाई का छिड़काव करते हैं। हम गोबर के खाद से ही खेती करते हैं। गुड़ बनाने के लिए सबसे पहले गन्ने का रस निकालते हैं। जिसके बाद रस को छानने के बाद करीब 4 घंटे तक उसे कड़ाई में उकाला जाता है। जिससे वह गाढ़ा हो जाता है। जिसके बाद उसे लकड़ी के चाके में डाला जाता है। जिससे वह थोड़ा सूख जाता है।

साथ ही बताया ही हमें गुड़ बेचने के लिए किसी मंडी में भी नही जाना पड़ता है, हम अपना गुड़ घर से बेच देते हैं। गुड़ की खोड़ियां भी किसान खुद ही बनाते हैं क्योंकि खोड़ी को गोल आकार देना और किसी को नहीं आता है। इनके हाथों से बनने वाली खोड़ियां भी लगभग 1 किलो की होती हैं। रोजाना करीब 4 से 5 क्विंटल गुड़ बनाया जाता है। ईश्वर बताते हैं कि शहर से आने वाले लोग अपने परिजनों के लिए विदेश तक गुड़ भिजवाते हैं। जो उन्हें भी काफी पसंद आता है। हर साल ठंड शुरू होते ही गुड़ की डिमांड बढ़ने लग जाती है।

150 से 200 रुपए तक कीमत

इनके गुड़ की कीमत सामान्य गुड़ की कीमत से काफी ज्यादा है। सामान्य गुड़ बाजारों में 30 से 40 रुपए किलो में मिल जाता है लेकिन इनका गुड़ 150 से 200 रुपए तक बिकता है।

काजू-बादाम वाला केसरयुक्त गुड़ भी उपलब्ध

यहां पर लोगों के कहने पर केसरिया व काजू बादाम युक्त गुड़ भी बनाया जाता है। यहां खरीददार अपने हिसाब से गुड़ बनवाते हैं। इस गुड़ की कीमत सामान्य गुड़ से कई गुना ज्यादा होती है।

15 मजदूर लगे हुए हैं

गुड़ बनाने के लिए गन्ने काटने से लेकर गुड़ तैयार करने तक रोजाना करीब 15 मजदूर यहां काम करते हैं। जिन्हें रोजाना दिहाड़ी भी दी जाती है। ईश्वर बताते हैं कि जिन लोगों को शुगर की बीमारी होती है। वह मीठा नहीं खाते हैं, लेकिन शुगर के मरीज भी हमारे यहां से गुड़ ले जाकर इसकी चाय व खाने की सामग्री बनाने में इस्तेमाल करते हैं। वह भी इस गुड़ का सेवन करते हैं।