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कैमरे लगे लेकिन लाइव स्ट्रीमिंग क्यों नही? हाईकोर्ट का एमपी सरकार से सवाल

live streaming: कांग्रेस विधायकों की याचिका पर सुनवाई करते मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा- विधानसभा कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग क्यों नहीं हो रही?

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इंदौर

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Akash Dewani

Apr 19, 2025

High Court questions MP government over no live streaming assembly proceedings indore

live streaming: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (MP High Court) ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर विधानसभा में लाइव स्ट्रीमिंग (live streaming) नहीं होने का कारण पूछा है। जस्टिस विवेक रुसिया और जस्टिस गजेंद्रसिंह ने सरकार से छह सप्ताह में जवाब मांगा है। विधायक सचिन यादव और प्रताप ग्रेवाल की जनहित याचिका में कहा कि केंद्र सरकार ने 2019 में सभी 37 विधानसभा, विधान परिषद को डिजिटल करने और कार्यवाही के लाइव प्रसारण के लिए नेशनल ई-विधानसभा एप्लिकेशन शुरू की। शुरुआत के तीन साल केंद्र सरकार ही इसका रखरखाव करती। सभी को बजट आवंटित किया।

सदन की कार्यवाही देखना मतदाता का अधिकार- हाईकोर्ट

बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र, नागालैंड सहित 10 विधानसभाओं में इसी योजना के बाद लाइव प्रसारण शुरू हुए। मध्यप्रदेश विधानसभा में कैमरे लगाने सहित अन्य व्यवस्थाएं कीं, पर लाइव स्ट्रीमिंग नहीं हुई। जनप्रतिनिधि ने विधानसभा में कितने मुद्दे रखे, कितने प्रायवेट बिल लाए, विधेयकों पर बहस में किस तरह से बात रखी, यह देखने का साधन नहीं है। यह मतदाता का अधिकार है कि वो जनप्रतिनिधि की कार्यप्रणाली का आकलन कर सके। मतदाताओं की जागरूकता के लिए यह आवश्यक है। कोर्ट ने इसे सही मान मुख्य सचिव और विधानसभा के प्रमुख सचिव से जवाब मांगा।

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गांधी मेडिकल कॉलेज की नियुक्तियों पर छह सप्ताह में मांगा जवाब

जबलपुर हाईकोर्ट ने 2021 में गांधी मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) भोपाल में लैब असिस्टेंट और तकनीशियन की नियुक्तियों पर सख्ती दिखाई। चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत व जस्टिस विवेक जैन की पीठ ने छह सप्ताह में जांच समिति की रिपोर्ट देकर आवश्यक कार्रवाई करने को कहा। भोपाल के वीर सिंह लोधी ने जनहित याचिका में जीएमसी में लैब असिस्टेंट व तकनीशियन पर्दो पर नियम विरुद्ध नियुक्तियां होने और शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं होने की बात कही। सरकार ने 1 मई 2024 और 19 सितंबर 2024 को जांच समिति बनाई पर रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की।

सुनवाई के बाद कोर्ट ने समिति को निर्देश दिए कि वह मामले पर विचार कर छह सप्ताह में निर्णय ले। निर्णय की कॉपी याचिकाकर्ता को दे। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता निर्णय से संतुष्ट न हो, तो विधि अनुसार उचित फोरम में आपत्ति कर सकते है।