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‘गर्भपात’ पर पति-पत्नी आमने-सामने, इंदौर हाईकोर्ट ने सुलह का रास्ता चुना

MP High Court: महिला ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर गर्भसमापन की अनुमति मांगी है। महिला की मेडिकल जांच रिपोर्ट भी सीलबंद लिफाफे में कोर्ट के समक्ष पेश की जाएगी।

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Madhya Pradesh High Court:

Madhya Pradesh High Court: (Photo Source: AI Image)

Madhya Pradesh High Court: पति से अलग रह रही गर्भवती महिला द्वारा गर्भसमापन (अबॉर्शन) की अनुमति मांगे जाने के मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने पति-पत्नी के बीच सुलह और परामर्श की पहल की है। हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ के न्यायाधीश जस्टिस जय कुमार पिल्लई ने दोनों पक्षों को 5 जून को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं।

सुनवाई के दौरान पति की ओर से प्रस्तुत अधिवक्ता ने दलील दी कि मामला केवल दंपती के विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि गर्भ में पल रहे बच्चे के भविष्य से भी जुड़ा है। ऐसे में दोनों पक्षों के बीच सुलह का प्रयास किया जाना चाहिए। कोट ने इस सुझाव को स्वीकार करते हुए अगली सुनवाई 5 जून को निर्धारित की। उसी दिन महिला की मेडिकल जांच रिपोर्ट भी सीलबंद लिफाफे में कोर्ट के समक्ष पेश की जाएगी।

तलाक लेने का निर्णय किया

यह रिपोर्ट हाईकोर्ट के निर्देश पर गठित मेडिकल बोर्ड द्वारा तैयार की गई है। दरअसल, महिला ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर गर्भसमापन की अनुमति मांगी है। याचिका के अनुसार उसकी शादी धार जिले के धरमपुरी क्षेत्र के एक युवक से हुई थी। 5 मई को पति के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होने के बाद वह उससे अलग रहने लगी और तलाक लेने का निर्णय किया। महिला का कहना है कि वह वर्तमान परिस्थितियों में गर्भावस्था जारी नहीं रखना चाहती।

मामले की पिछली सुनवाई में हाईकोर्ट ने पुलिस को केस डायरी पेश करने के निर्देश दिए थे, लेकिन धरमपुरी थाना पुलिस ने धार जिले में कानून-व्यवस्था संबंधी व्यस्तताओं का हवाला देते हुए डायरी प्रस्तुत नहीं की। इस पर कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा था कि गर्भावस्था के चिकित्सकीय समापन से जुड़े मामलों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

बच्चे के भविष्य का भी है सवाल

सुनवाई के दौरान पति की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत से आग्रह किया कि मामले में केवल पति-पत्नी के विवाद को नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि गर्भ में पल रहे बच्चे के भविष्य और हितों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। अधिवक्ता ने कहा कि गर्भ समापन का निर्णय एक गंभीर विषय है और इसमें पति को भी अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए। पति की ओर से यह भी निवेदन किया गया कि अदालत दोनों पक्षों के बीच समझौते और सुलह की संभावना तलाशे। इस तर्क को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने मामले में परामर्श और काउंसिलिंग की प्रक्रिया शुरू करने का निर्णय लिया।