
Indore Contaminated Water (फोटो सोर्स: पत्रिका)
Indore Contaminated Water: 2017 से सबसे स्वच्छ शहर… 2021 में वाटर प्लस सिटी का अवॉर्ड लेने वाले इंदौर में दूषित पानी से हुई 16 मौतों का जिम्मेदार नगर निगम, नगरीय विकास मंत्री और अफसर ही हैं। पूरा विभाग व सरकार 5 साल पहले 2020 से ही जानती थी कि इंदौर-भोपाल में पानी दुषित है। महालेखाकार परीक्षक (कैग) की 2018 की रिपोर्ट 2020 में विधानसभा को पटल पर रखी गई थी। इसमें भोपाल-इंदौर में जलस्रोतों से प्राप्ति, वितरण, पानी की बांदी की ऑडिट थी। कैग ने 2013 से 2018 की रिपोर्ट में ही बताया था कि इंदौर ही नहीं, भोपाल में भी पानी का सिस्टम फेल, तब भी बैक्टीरिया मिला पानी पी रहे थे लोग।
कैग रिपोर्ट में दोनों निगम सामाजिक क्षेत्र के ऑडिट में जल प्रदाय व्यवस्था में फैल थे। फिल्टर प्लांट व टंकियों से पानी वितरण में 30 से 70% की रेंज का अंतर था। पानी की बर्बादी रोकने की व्यवस्था नहीं, लीकेज पता लगाने को डिटेक्शन सेल भी निगमों में नहीं थे। वॉल्व व सप्लाई सिस्टम में प्रवाह मीटर नहीं लगाए। जलापूर्ति की निगरानी का सिस्टम नहीं था। 2013 से 2018 तक इंदौर-भोपाल में 4481 पानी सैंपल फेल हुए। 54 सैंपलों में से 10 खराब थे। इनमें गंदा पानी, फिकल कॉलीफॉर्म मिला। फिर भी 5 साल में जिम्मेदारों ने सिस्टम नहीं बनाया। नतीजा, इंदौर में गंदे पानी से हैजा फैला, 16 मौतें हुई। अभी अस्मतालों में 149 मरीज हैं। 20 आइसीयू में हैं।
भोपाल में दूषित पानी से 16 मौतों के बाद शनिवार को समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मनोज यादव ने नगरीय विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के बयान और सरकारी लापरवाही के खिलाफ आंदोलन किया। सपा कार्यकर्ता मंत्री के भौपाल स्थित सरकारी आवास पर पहुंचे। मंत्री की तस्वीर और नेम प्लेट पर कालिख पोत दी। इस दौरान पुलिस से झड़ा भी हुई।
कैग रिपोर्ट के अनुसार, लीकेज कंटोल प्रोगाम नहीं थे। मरम्मत के लिए अनुबंध न होने से साध्यक यंत्री, उपयंत्री के जरिए मरम्मत के टेंडर निकाले। वार्ड वार टेंडर जारी करने से लीकेज सुधारने में 22 से 182 दिन की देरी हुई। इंदौर में पाइपलाइन के टेंडर में देरी का कारण भी इसी अकर्मण्य व्यवस्था को माना जा रहा है।
कैग रिपोर्ट के अनुसार, निगम क्षेत्र में पानी सप्लाई के आंकड़े और वास्तविक जल वितरण में बड़ा अंतर मिला। भोपाल में प्रति व्यक्ति 9 से 20 लीटर तो इंदौर में 36 से 62 लीटर रोजाना का अंतर था। क्योंकि निगम ने प्रति व्यक्ति मांग, टंकियों में उपलब्ध पानी और फिल्टर प्लांट पर उपलब्ध पानी की गणना नहीं की।
2025 में खामियाजा… इंदौर में पानी सप्लाई होता रहा, नाले और शौचालय के पानी से मिलता रहा। इसकी गणना ही नहीं हुई कि जितना पानी मेजा, उसमें से कितना घरों तक पहुंचा।
वर्ष 2013 से 2018 तक इंदौर-भोपाल नगर निगमों में 4481 रीफल फेल हो गए। वे बीआइएस मानक 10500 के नीचे थे। निगमों ने क्या कार्रवाई की रिकॉर्ड नहीं। जांच में 54 में 10 सफल फेल हुए, इनमें फिकल कॉलीफॉन मिला। इंदौर में 5.33 लाख, भोपाल में 3.62 लाख को गंदा पानी दिया। पीएचई ने 5.54 लाख में पानी से बीमारियां रिपोर्ट की।
2025 में हैजा-डायरिया… भागीरथपुरा इंदौर में पानी के 20 संपलों की जांच में से कुछ में ई कोलाई व बिब्रियो कॉलरी बैक्टीरिया मिला। इससे हैजा तेजी से फैलता है।
कैग रिपोर्ट के अनुसार, 2018 तक जांच में 15 उच्चस्तरीय टंकियों में से 23 में न जो नियमित अंतराल पर सफाई की गई और न ही टंकियों में मिली मिट्टी की बैक्टिरियल जांच कराई गई।
इंचौर निगम ने बोरवेल का पानी बिना जांच ही सप्लाई किया। 20 बोरवेल के पानी में आयरन नाइट्रेट कैल्शियम, कंडक्टिविटी या फिकल कॉलीफॉर्म। बीआइएस मानक पर खरे नहीं।
84 शहरों के बीच 2021 में वाटर प्लस सिटी का दर्जा मिला। यह उन शहरों को मिलता है, जो बिना ट्रीटमेंट सीवेज नदियों, जल निकायों में न जाने दे।
निगम ने वाटर प्लस सिटी के लिए ₹300 करोड़ से नाला टैपिंग कर दो नदियों, 27 नालों को सीवर मुक्त करने का दावा किया। भागीरथपुरा में पोल खुल गई।
Published on:
04 Jan 2026 02:32 pm
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