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बच्चा चोरी की आरोपी मां को ‘सगी’ बच्ची की कस्टडी नहीं, इंदौर हाइकोर्ट का बड़ा फैसला

High Court decision: हाईकोर्ट ने दो साल की बच्ची की कस्टडी मां को देने से इनकार करते हुए कहा कि बच्ची बाल कल्याण समिति की सुरक्षित अभिरक्षा में है। अदालत ने कस्टडी देना बच्ची के हित में नहीं माना।
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High Court decision: हाईकोर्ट ने खारिज कर दी याचिका (Photo Source - Patrika)

High Court decision: हाईकोर्ट ने खारिज कर दी याचिका (Photo Source - Patrika)

Child custody: करीब दो साल की बच्ची की कस्टडी उसकी मां को देने के लिए दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है। जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस आलोक अवस्थी की कोर्ट ने आदेश में कहा कि बालिका किसी की अवैध हिरासत में नहीं है, बल्कि उसे रतलाम की बाल कल्याण समिति की अभिरक्षा में रखा गया है। ऐसे में उसे याचिकाकर्ता महिला को सौंपना न तो सुरक्षित और न ही बालिका के सर्वोत्तम हित में होगा। हालांकि कोर्ट ने महिला को अन्य वैधानिक उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी है।

जमानत पर है महिला

खुद को खजराना निवासी बताने वाली मां ने याचिका में दावा किया था कि वह सामूहिक दुष्कर्म की पीड़िता है। आरोपियों ने उसकी बेटी को उससे छीन लिया था और बाद में रतलाम रेलवे स्टेशन पर छोड़ दिया। उसने एफआइआर दर्ज कराई। उसकी बेटी रतलाम की बाल कल्याण समिति की अभिरक्षा में है, इसलिए उसकी कस्टडी उसे सौंपी जाए। सरकार की ओर से याचिका का विरोध करते हुए बताया कि मई 2025 में महिला को रतलाम के सिविल अस्पताल से चार वर्षीय बच्ची के चोरी (अपहरण) मामले में रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार किया था। उसके कब्जे से बच्ची बरामद हुई थी।

बच्ची की पहचान उसके वास्तविक परिजन ने की थी। इस मामले में महिला जमानत पर है। बाल कल्याण समिति की सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट में उल्लेख है कि महिला पहले भी अपनी बेटी को लावारिस छोड़ चुकी है। उसकी आपराधिक पृष्ठभूमि और व्यवहार को देखते हुए बच्ची की कस्टडी उसे देना उचित नहीं होगा।

दस्तावेजों में विरोधाभास

हाईकोर्ट ने आदेश में कहा कि महिला ने सरकार के जवाब का प्रति उत्तर दाखिल नहीं किया। अदालत ने पूछा कि बेटी के कथित अपहरण की एफआइआर दर्ज कराने में 20 दिन की देरी क्यों हुई, लेकिन महिला की ओर से संतोषजनक उत्तर नहीं दिया गया। रतलाम बाल कल्याण समिति ने हाईकोर्ट को बताया था कि 2024 में जब बालिका 13 माह की थी, तब भी वह महिला बिछड़ गई थी। जांच के बाद बच्ची उसे सौंप दी गई थी। महिला ने बच्ची की कस्टडी लिए जो दस्तावेज प्रस्तुत किए, उनमें विरोधाभास पाए गए। समिति ने बताया था कि महिला ने परिवार व पूर्व विवाह से जुड़े तथ्यों की जानकारी भी छिपाई थी।

इंदौर हाईकोर्ट का फैसला

एक अन्य मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने साइबर अपराध की जांच के नाम पर केवल साइबर सेल के ई-मेल के आधार पर बैंक खाते फीज करने की कार्रवाई पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायालय ने उज्जैन निवासी हेमंत बैरागी का एचडीएफसी बैंक खाता अनफीज करने के निर्देश देते हुए कहा कि यदि किसी खाते में साइबर अपराध से जुड़ी विवादित राशि होने का दावा है तो उसे सावधि जमा (एफडी) में रखा जा सकता है, लेकिन पूरे बैंक खाते का संचालन अनिश्चितकाल तक नहीं रोका जा सकता।