
Karpoor Chandra Kulish Birth Centenary Indore(photo:patrika)
Karpoor Chandra Kulish Birth Centenary: देश की भलाई की भावना लेकर जो अखबार चलाते हैं, जो शब्द की सेवा करते हैं, जो अक्षर की आराधना करते हैं, वे अक्षय हो जाते हैं। वे कुलिश जी हो जाते हैं। सरस्वती और लक्ष्मी की आराधना का संगम अगर प्रयागराज में होता है तो कुलिश जी को देखकर समझा जा सकता है कि यहां लक्ष्मी और सरस्वती का संगम है। वे अक्षर के रूप में प्रतिदिन जन्म लेते हैं। वे अक्षर कभी मिटाए नहीं जाते, उनके पास अमरता का सोपान होता है, क्योंकि वे वर्णों के आराध्य थे।
यह कहना था कवि सत्यनारायण सत्तन का। वे राजस्थान पत्रिका के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश जी के जन्मशती महोत्सव के उपलक्ष्य में कुलिश जी के व्यक्तित्व-कृतित्व पर आयोजित व्याख्यान में बोल रहे थे। गुरुवार को इंदौर के देवास नाका स्थित एनआइएफ, ग्लोबल कैंपस में हुए आयोजन में अंतर्मुखी मुनि पूज्यसागर महाराज का सान्निध्य रहा। देवपुत्र के संपादक गोपाल माहेश्वरी भी बतौर अतिथि उपस्थित रहे। इस अवसर पर पत्रकारिता और फैशन डिजाइनिंग में रचनात्मक प्रतिभा वाले विद्यार्थियों अभिनय देशमुख, दीक्षा कहार, प्रखर मौर्य, आशी जैन और विंजल जैन का सम्मान भी किया गया। आयोजन में कारोबारी एवं समाजसेवी संदीप जैन, जितेन्द्र जैन, नरेन्द्र वेद और रेखा जैन ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम की शुरुआत कुलिश जी के चित्र पर माल्यार्पण से हुई। संचालन साहित्यकार मुकेश तिवारी ने किया।
सत्तन ने कहा कि भेदभाव को दूर करने के लिए संक्षेप में जो संचार होता है, उस संचार को प्रतिदिन अखबार के रूप में समाज के सामने प्रस्तुत करने का काम जो कुलिश जी द्वारा किया गया, उसके कई मायने हैं। कुलिश जी ने अपनी वाणी और लेखन के प्रभाव से अपनी उपयोगिता सिद्ध की। कुलिश जी कभी लेखक थे, कभी पत्रकार थे, कभी समाज सुधारक थे और न जाने क्या-क्या थे। वे एक सच्चे इंसान थे।
मुनि पूज्य सागर महाराज ने कहा कि सरल सहज शब्दों में कहें तो कुलिश जी ऐसे व्यक्ति थे, जो समाज, परिवार और देश का विकास संस्कार और संस्कृति के साथ करना चाहते थे। उनका मानना था कि विकास हो, पर संस्कार और संस्कृति के साथ हो। हम जब गुलाब कोठारी जी को पढ़ते हैं तो इस बात का अहसास स्वयं कर सकते हैं कि कुलिश जी कैसे होंगे। उनके लेखन में ताकत थी। सरकार को दर्पण दिखाने का काम उन्होंने किया। कुलिश जी की जन्मशती पर्व पर हम यही चाहेंगे कि पत्रकारिता के जो गुण उनके अंदर थे, उसे वर्तमान में पत्रकारिता कर रहे छात्रों को पढ़ना चाहिए। उनके जीवन चरित्र को जानना चाहिए, जिससे पता चले कि पत्रकारिता निष्पक्षता के साथ कैसे की जा सकती है।
देवपुत्र के संपादक गोपाल माहेश्वरी ने कहा कि वज्र को कुलिश कहते हैं, जो देवराज इंद्र का शस्त्र है। रहस्य यह है कि वह देवराज की सत्ता का प्रतीक नहीं है, वह दाधीच के त्याग और तपस्या का प्रतीक है। त्याग और तपस्या इंद्र को राजा बने रहने की शक्ति प्रदान करता है। कुलिश जी ने वेद की विशेषताओं का प्रकाशन किया। इस सरलतम भूमिका तक ले आए कि आम व्यक्ति उसे समझ सके, इसलिए उसे लोक भाषा में अभिव्यक्त किया। समाज की इससे बड़ी कोई सेवा नहीं हो सकती। जब सनातन तत्वों और शाश्वत तत्वों को अपने समकालीन समाज और भविष्य की पीढि़यों के लिए इतना सरलतम बनाकर प्रस्तुत कर दें कि उसे परंपरा के अंगभूत होकर अपना जीवन सार्थक कर सके। कुलिश जी का कार्य इसी परिप्रेक्ष्य में देखा गया।
एनआइएफ के प्रमुख संदीप जैन ने कहा कि कुलिश जी ने पत्रिका रूपी जो पौधा रोपा था, वह आज वट वृक्ष का रूप लिए हुए है। इसमें गुलाब कोठारी जी का भी बहुत बड़ा योगदान है। पौधा लगाना, उसे सींचना और पौधे में फल आए ऐसी व्यवस्था करना, यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है।
नरेन्द्र वेद ने कहा कि शहर में पहली बार पत्रकारिता से जुड़ा इतना अच्छा व्याख्यान हुआ है। मुनि पूज्यसागर के सान्निध्य में अच्छा आयोजन हुआ।
जितेन्द्र जैन ने कहा कि पत्रिका के संस्थापक कुलिश जी की जीवन यात्रा हमें सिखाती है कि अगर इरादे मजबूत हों तो छोटे से शुरू हुए प्रयास भी एक दिन इतिहास बन जाते हैं।
Updated on:
20 Mar 2026 10:33 am
Published on:
20 Mar 2026 10:32 am
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