
लोक सभा चुनाव की चौसर बिछ गई है। दांव-पेंच की रणनीति बनाई जा रही है। इसमें अहम है प्रचार की रणनीति। गुजरते दशकों के साथ सबसे ज्यादा बदलाव प्रचार के तरीकों में ही हुआ है। एक जमाना था जब मालवा-निमाड़ में ठेठ देसी अंदाज में प्रचार कि या जाता था। तब न तो सोशल मीडिया वॉर रूम बनते थे और ना ही मतदाताओं को रिझाने करने के लिए ऑडियो-वीडियो जैसे संवाद संपर्क थे।
तब स्थानीय बोली में मुनादी कर कि सी भी पार्टी की सभा या बड़े नेता के गांव में आकर प्रचार करने की सूचना दी जाती थी। मालवी में कहा जाता था हुणो... हुणो... हुणो... हवेर 10 वागे सभा हे... यानी सुनो... सुनो... सुनो... सुबह 10 बजे सभा होगी। गीत और कटाक्ष संवाद मालवांचल के अहम जिले रतलाम और मंदसौर में मालवी बोली चलन में है। जब-जब चुनाव आते हैं तो प्रचार में चुनावी गीत, पैरोडी, डायलॉग और कटाक्ष संवाद सुनाई देते हैं। हालांकि अब प्रचार के मैदान से मुनादी गायब हो गई है। उसकी जगह आधुनिक संसाधनों ने ले ली है।
वर्तमान दौर में चुनावी विश्लेषण एआइ आधारित होने लगे हैं, लेकिन बीते कुछ दशकों तक चुनावी ऊंट की क रवट को भांपने के लिए खेत से लौटते समय बैलगाड़ी और खलिहान में कटी फसल के बीच गुणा-भाग लगते थे। खरगोन जिले के ग्राम बनिहार के बुजुर्ग शांतिलाल पाटीदार और पीपरी के पंढरीनाथ दाजी निमाड़ी शैली में भाषण के लिए जाने जाते थे। अब नई पीढ़ी विरासत को आगे नहीं बढ़ा पा रही। कुछ सभाओं में जरूर निमाड़ी सुनाई देती है, लेकिन वो अपनापन नहीं रहा। एक राजनीतिक दल से जुड़े महेश पाटीदार बताते हैं कि पहले नुक्कड़ सभाओं में निमाड़ी बोली ही लोगों को आकर्षित करती थी।
- स्थानीय बोली के क वि सम्मेलन।
- कई इलाकों में नाटकों से प्रचार।
- लोक गायक और गीत-संगीत मंडली भी
- हाट बाजार में भी होता था प्रचार।
ग्राम धराड़ के वरिष्ठ नागरिक बाबूसिंह व्यास बताते हैं 70, 80 के दशक में चुनाव की तारीख सुनने के लिए रेडियो के पास बैठ जाते थे। टीवी तो पूरी गली में किसी के घर नहीं थी। ज्यादा शोर भी नहीं होता था। कई लोगों को पता भी नहीं होता था कि कौन चुनाव लड़ रहा। पार्टी के आधार पर वोटिंग हो जाती थी। बड़े नेता जब प्रचार के लिए आते तो पार्टी की ओर से मुनादी कराई जाती थी। मुनादी में सभा का समय और स्थान बताया जाता था।
Updated on:
19 Mar 2024 09:40 am
Published on:
19 Mar 2024 09:38 am
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