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Rahat Indori: कभी छोटी-सी दुकान पर सुनाते थे शायरी, अब दुनिया कहती है शायरी के ‘शेर’

शेरो-शायरी के ‘शेर’ राहत इंदौरी के निधन पर सभी जगह शोक की लहर...।

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इंदौर

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Manish Geete

Aug 11, 2020

राहत इंदौरी

राहत इंदौरी

इंदौर। जाने-माने शायर राहत इंदौरी का मंगलवार को शाम को निधन हो गया। वे कोरोना से जंग हार गए हैं। उनके निधन पर उनके चाहने वाले मायूस हो गए हैं और 'राहत' के अब तक दिए पैगाम को याद कर रहे हैं।

मकबूल शायर व मुशायरों-महफिल की शान रहे राहत इंदौरी अब इस दुनिया में नहीं रहे। पिछले साल ही शेरो-शायरी के ‘शेर’ माने जाने वाले राहत इंदौरी को शायरी की दुनिया में पचास वर्ष हो गए थे। इसी मौके पर इंदौर में एक बड़ा जश्ने राहत का आयोजन किया गया। पूरे इंदौर ने अपने पसंदीदा शायर का इस मौके पर सम्मान किया था।

कभी कोने में बैठकर सुनते थे मुशायरा :-:

दुनियाभर में अपनी शायरी का लोहा मनवाने वाले राहत इंदौरी शुरुआत में काफी संघर्ष किया। वे मशहूर पेंटर भी थे। मालवा मिल क्षेत्र में साइन बोर्ड बनाया करते थे और कुछ-कुछ लिख कर यार-दोस्तों में गुनगुनाया करते थे। पहली बार उन्होंने रानीपुरा में मुशायरा पढ़ा था। यहां स्थित बज्म-ए-अदब लाइब्रेरी में अक्सर मुशायरे की महफिल सजा करती, राहत भी पहुंच जाते। एक तरफ बैठ सुनते-गुनते। एक दिन वहां मौजूद एक शायर की नजर उन पर पड़ गई। मंच पर बुला लिया और कहा कि आज तुम्हें मुशायरा पढऩा है, फिर क्या था! उन्होंने वो शेर सुनाए कि लोग उनके कायल हो गए। यहीं से शुरू हुआ सफर हाल ही में पचास वर्ष पूरे किए थे। शुरुआत में वे रानीपुरा में एक दुकान पर बैठा करते थे, तभी से वे शायरी सुनाया करते थे।

भजिए-पापड़ तोलकर देते थे :-:

लोग इतना सलाम करते कि वे हाथ उठा-उठाकर थक जाते। रानीपुरा में ही बापू करके एक खोपरा पाक-नमकीन की दुकान हुआ करती थी। जब दुकान पर बापू नहीं रहते तो राहत ही किसी ग्राहक के आने पर भजिये-पापड़ तौल कर दे दिया करते। रानीपुरा से उनका गहरा ताल्लुक रहा है। इंदौर से बाहर मुशायरा पढ़ने जहां भी जाते थे तो वे रानीपुरा व इंदौर का जिक्र जरूर करते हैं।

रानीपुरा के लिए उन्होंने शेर भी लिखा था और अक्सर मुशायरे में पढ़ा करते कि- सुखनवर ओटलों पर बैठते हैं, मेरी दिल्ली मेरा रानीपुरा है। वे आम आदमी को किस तरह से याद रखते हैं। उसका नमूना देखिए कि वे पहली बार पाकिस्तान गए, कराची में मुशायरा पढ़ने। उनके संगी साथी ने कहा कि पाकिस्तान जा रहे हो तो वहां से मेरे लिए अहमद फराज की किताब ले आना। वे सज्जन तो भूल गए कि इतना बड़ा शायर कहां ये बात याद रखेगा, लेकिन उनके दरवाजे पर स्कूटर खड़ा किया। डिग्गी में से किताब निकाली और उन्हें भेंट की तो वे देखते रह गए।

डॉ. राहत इंदौरी के कुछ मशहूर शेर

मैं आखिर कौन सा मौसम तुम्हारे नाम कर देता
यहां हर एक मौसम को गुजऱ जाने की जल्दी थी

घर के बाहर ढूंढता रहता हूं दुनिया
घर के अंदर दुनिया-दारी रहती है

तूफ़ानों से आंख मिलाओ, सैलाबों पर वार करो
मल्लाहों का चक्कर छोड़ो, तैर के दरिया पार करो

आंख में पानी रखो, होठों पे चिंगारी रखो
जिंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो

किसने दस्तक दी, दिल पे, ये कौन है
आप तो अन्दर हैं, बाहर कौन है

अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए
कितने शरीफ़ लोग थे, सब खुल के आ गए

कहीं अकेले में मिल कर झिंझोड़ दूंगा उसे
जहां-जहां से वो टूटा है, जोड़ दूंगा उसे

रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है
चांद पागल है, अंधेरे में निकल पड़ता है

हमसे पहले भी मुसाफिर कई गुजऱे होंगे
कम से कम राह के पत्थर