दरअसल राजभोज अपने दरबार में जाने से पहले यहां मंदिर में दर्शन करने आते थे, इसके बाद ही वे अपने दरबार में जाते थे। यही परंपरा आज भी जीवंत हैं। धार शहर में कोई भी अधिकारी ज्वाइन होता है तो सबसे पहले भगवान धारनाथ के दरवाजे पर मत्था टेकता है। इसके बाद ही अपनी नौकरी शुरू करता है।
धारेश्वर की यात्रा में पैदल चलते थे राजाभोजधारेश्वर मार्ग स्थित भगवान धारनाथ मंदिर राजा भोज के समय का है। भगवान धारनाथ की सवारी सावन माह में सभी सोमवार को निकाली जाती है। धारनाथ पालकी पर बैठकर भक्तों का हाल जानने निकलते हैं। माना जाता है कि ये धार के राजा हैं और प्रजा का हाल जानने स्वयं नगर भ्रमण पर निकलते हैं। यह परंपरा राजा भोज के समय से चली आ रही है। राजा खुद इस पालकी यात्रा में पैदल चलते थे।
60 किमी दूर है इंदौर सेइंदौर के संभागायुक्त संजय दुबे जब धार कलेक्टर हुआ करते थे, तो उन्होंने इस मंदिर के कायाकल्प का बीड़ा उठाया था। आज मंदिर परिसर में सुंदर बगीचा, फव्वारा लोगों को आकर्षित कर रहे है। लोग यहां परदर्शन के बाद घंटों बगीचे में बैठे रहते है। धार के धारेश्वर मंदिर की दूरी इंदौर से 60 किमी है। श्रावण मास में बाबा का छबीना निकाला जाता है। छबीने की परंपरा भी वर्षों पुरानी है। बाबा को पुलिस बल द्वारा गार्ड आफ आनर दिया जाता है इसके बाद बाबा प्रजा का हाल जानने के लिए शहर भर का भ्रमण करते है। पहली पूजा और आरती कलेक्टर, विधायकों के द्वारा की जाती है। बाबा धारनाथ को धार का अधिपति राजा भी माना जाता है।