4 जून 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

‘मां’ दूसरे व्यक्ति के साथ रहने पर अड़ी, हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने रखी शर्त

Indore High Court: इंदौर हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में जस्टिस प्रणय वर्मा और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की।

2 min read
Google source verification
Indore High Court:

Indore High Court: (Photo Source - Patrika)

Indore High Court: एमपी में हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने एक नाबालिग बालिका की अभिरक्षा (कस्टडी) से जुड़े मामले में आदेश देते हुए उसकी अस्थायी कस्टडी मां को सौंप दी है। साथ ही शर्त भी रखी है कि सक्षम न्यायालय की अनुमति के बिना बालिका को राजस्थान की सीमा से बाहर नहीं ले जा सकेंगे। जस्टिस प्रणय वर्मा और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। मां, उसके साथ रहने वाला व्यक्ति, बालिका और पिता सभी उपस्थित हुए।

कोर्ट ने बंद कमरे में आवश्यक पक्षों के बीच चर्चा करते हुए बालिका की इच्छा भी जानी। मामला मूसाखेड़ी क्षेत्र निवासी एक व्यक्ति द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने कहा था कि उसकी पत्नी और 11 वर्षीय बेटी 4 मई से लापता हैं। उसने दोनों के राजस्थान में होने की आशंका जताते हुए पुलिस आयुक्त को शिकायत की थी। इसके बाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई।

पति के साथ नहीं रहना चाहती महिला

सुनवाई के दौरान पुलिस की कार्रवाई के बाद 25 मई को महिला और बालिका कोर्ट में पेश हुई थीं। उस समय महिला ने स्पष्ट कहा था कि वह अपने पति के साथ नहीं रहना चाहती और राजस्थान के कुंभलगढ़ में रहना चाहती है। इसके बाद न्यायालय ने महिला की कथित अवैध हिरासत से जुड़ा मुद्दा समाप्त कर दिया था, लेकिन नाबालिग बालिका की अभिरक्षा का प्रश्न विचाराधीन रखा था।

बालिका की देखभाल करेगा

बुधवार को सुनवाई में बालिका ने अपनी मां के साथ रहने की इच्छा व्यक्त की। मां ने कोर्ट को कहा कि वह बालिका की बेहतर देखभाल कर सकती है। इंदौर में पति अपने 17 वर्षीय पुत्र के साथ रहते है तथा वहां बालिका की देखभाल के लिए परिवार का कोई सदस्य नहीं है। मां के साथ रहने वाले व्यक्ति ने लिखित आश्वासन दिया कि वह बालिका की देखभाल करेगा। उसकी बहन ने भी कुंभलगढ़ में रहकर बालिका के पालन-पोषण में सहयोग की सहमति दी।

बच्ची का हित सर्वोपरि

खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि हिंदू अल्पसंख्यकता एवं संरक्षकता अधिनियम के अनुसार पांच वर्ष से अधिक आयु के बच्चों का पिता प्राकृतिक संरक्षक माना जाता है, लेकिन अभिरक्षा विवादों में बच्चे का कल्याण सर्वोपरि होता है। परिस्थितियों को देखते हुए अस्थायी कस्टडी मां को सौंपना उचित माना। यह स्वतंत्रता भी बरकरार रखी है कि पिता यदि चाहे तो नाबालिग बालिका की वैधानिक अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए सक्षम न्यायालय के समक्ष उचित कानूनी कार्यवाही कर सकता है।