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1977 से उड़ान भर रहा है जोशी का फ्लाइंग ‘दही बड़ा, शाम होते ही लगने लगती है भीड़

सराफा बाजार में शाम होते ही बढ़ जाती है इस दुकान पर भीड़.....

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इंदौर। शहर में जहां दिन की शुरुआत गली-चौराहों पर मिलने वाले गरमा गरम पोहे-जलेबी से होती है तो नींद भी पहले गली-बाजारों में मिलने वाले जायकों का लुत्फ लेती हुई आंखों तक पहुंचती है। ऐसे ही मिर्च-मसालों की ठसक और मेवे-मिष्ठान की महक वाले इस इंदौर में खिलाने का अंदाज भी निराला है। परोसने वाला कभी करतबबाज बन जाता तो कभी आगंतुक के आने पर उन्हें शहंशाह कहकर खुद गुलाम बन जाता है। जादूगरी ऐसी कि पता ही नहीं चलता कि कब पांच मसाले एक चुटकी में दबा लिए और बारी-बारी से उन्हें दही बड़े पर डाल भी दिए। यह खासियत है सराफा में मिलने वाले जोशी के दहीबड़े की जो 1949 से अब तक स्वाद के शौकीनों के दिल पर राज करते आ रहे हैं।

लोगों को रास आया तरीका

असल में आज जहां जोशीजी की बड़ी दुकान नजर आती है किसी वक्त वहां ठेले पर कचौरी, भजिए और दहीबड़े बिका करते थे। खाने वालों की भीड़ तब भी कम नहीं लगती थी। वक्त के साथ दुकान का दायरा बढ़ा और परोसगारी का अंदाज जुदा हुआ। ओमप्रकाश जोशी बताते हैं कि इस दुकान की शुरुआत उनके दादाजी हिंदूजी जोशी ने की थी। बाद में पिता रामचंद्रजी जोशी ने उसे आगे बढ़ाया और 1977 में मैंने पुश्तैनी कार्य को आगे बढ़ाने का जिम्मा उठाया। यह बात अलग है कि आज दही बड़े के नाम से ख्याति है, जबकि 1977 के पहले शहर के अधिकांश लोग रामचंद्रजी कचौरी वाले के नाम से पिता को संबोधित करते थे। जब मैंने दुकान पर बैठना शुरू किया तब दहीबड़े को कुछ अलग अंदाज में परोसने के लिए उसके दोने को उछालना शुरू किया। भगवान की कृपा से बात बन गई और यह तरीका लोगों को रास आ गया।

प्रेम से खिलाते हैं

ओमप्रकाश कहते हैं कि जहां तक आगंतुकों से किए जाने वाले व्यवहार की बात है तो मेरा मानना है कि ग्राहक ईश्वर के समान है और उसे प्रेम से खिलाना चाहिए। इसके अलावा शुद्धता और गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया जाता है। दही जमाने से लेकर दहीबड़े की दाल खरीदने, भिगोने, पीसने तक की जिम्मेदारी खुद निभाते हैं। यह बड़े मूंगदाल के बनाए जाते हैं और नमक, रंग वाली लालमिर्च, तीखे स्वाद वाली लाल मिर्च, जीरा पाउडर और अजवाइन पाउडर दही बड़े पर डालते हैं ताकि स्वाद के साथ सेहत भी बरकरार रहे।

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