
श्रुति अग्रवाल. इंदौर . वो मेरा पहला दिन था...एक प्रोफेसर के भीख मांगने का पहला दिन। लडख़ड़ाते हुए कदमों से मैं मुंबई की लोकल के डिब्बे में चढ़ा। ट्रेन सात-आठ किलोमीटर दूर जा चुकी थी। मेरा हौसला जवाब दे रहा था। कांपते हाथों से डिब्बा बाहर निकाला, गले में रुंधते शब्दों को आवाज दी और लोगों को ग्रामीण बच्चों की पढ़ाई के बारे में जागरूक करते हुए भीख मांगने का सफर शुरू किया। अपनी पहली कोशिश में 700 रुपए जमा हुए जिनमें से ज्यादातर एक या दो के सिक्के थे।
यह अनूठी कहानी है मुंबई के प्रो. संदीप देसाई की, जिन्होंने 26 सितंबर 2010 को पहली बार लोकल ट्रेन में ग्रामीण बच्चों की पढ़ाई के लिए चंदा मांगा। प्रो. देसाई मंगलवार को शहर में एक स्कूल के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। पत्रिका से विशेष चर्चा में प्रो. देसाई कहते हैं कि सिक्कोंं की वह खनक आज छह स्कूलों में बच्चों का बेहतरीन भविष्य बना रही हैं।
मुंबई लोकल ही क्यों? इस सवाल के जवाब में वे बताते हैं कि मुंबई की लोकल से पहले मैंने लोगों के घरों के दरवाजे खटखटाए, लेकिन मुनासिब जवाब नहीं मिला। किसी को मैं सैल्समेन लगा तो किसी को कुछ और। उसके बाद लोकल में सफर करने के दौरान महसूस हुआ कि लोगों से कनेक्ट करने का यह अच्छा मौका है। इसके बाद मैंने कदम बढ़ाया तो लोगों ने साथ देना शुरू कर दिया। अब मैं जब भी मुंबई में होता हूं तो लोकल में जाकर बच्चों के लिए धन जमा करने का काम जरूर करता हूं। बूंद-बंूद से सागर भरता है। मैं भी वहीं करने की कोशिश कर रहा हूं।
60 से ज्यादा वसंत देख चुके प्रो. देसाई मरीन इंजीनियर थे। देश-दुनिया में घूमने के बाद उन्होंने कॉर्पोरेट जगत में काम किया। उसके बाद कदम रखा अध्यापन की दुनिया में। अपने प्रोजेक्ट्स के समय वह गांवों की गलियों की खाक छानते, वहां वे मासूम बचपन को नाजुक उम्र में पीठ पर बस्ते की जगह जिम्मेदारियों का बोझ उठाए घूमते देखते।
बस इन बच्चों को पढ़ाने के उद्देश्य से उन्होंने 2001 में श्लोक मिशनरी नाम से ट्रस्ट का गठन कर गरीब बच्चों को अंग्रेजी भाषा में तालीम देना शुरू किया। 250 से ज्यादा कॉर्पोरेट ग्रुप्स से संपर्क करने के बाद जब निराशा हासिल हुई तो उन्होंने आम लोगों को इस सफर से जोडऩे का निश्चय किया।
घर के सामने कूड़ा बीनते बच्चों ने उड़ाई नींद
प्रो. देसाई बताते हैं कि वे सोकर उठते तब बच्चों के स्कूल जाने का समय होता था। वे अच्छे घरों के बच्चों को पीठ पर बैग टांगकर स्कूल जाते देखते तो दूसरी तरफ अलसुबह ही गरीब बच्चे पीठ पर बोरा लेकर कूड़ा बीनते मिलते। एक ही समय की दो अलग तस्वीरों ने उनके आंखों की नींद और मन का चैन चुरा लिया और उन्होंने श्लोक मिशनरीज की नींव रख दी।
सात साल में जमा किए दो करोड़ रुपए
आज उनके तीन बड़े और तीन छोटे स्कूल हैं। सभी में अंग्रेजी माध्यम में ही पढ़ाया जाता है। प्रो. देसाई बताते हैं कि लोकल ट्रेन में वे बेहद आम लोगों से मिलते हैं। पहले हिंदी में अपनी बात समझाते हैं, फिर मराठी का सहारा लेते हैं और अंत में फर्राटेदार इंग्लिश सुन लोग चौंक जाते हैं।
Published on:
20 Dec 2017 01:05 pm
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