
अंग्रेजो के जमाने से इस मंदिर को जानती है पूरी दुनिया
संजय रजक@डॉ.आंबेडकर नगर(महू).
अंग्रेजों के शासन काल में तैनात ब्रिटिश सेना श्रीगोपाल मंदिर गोपाल जी महाराज की अदभुत मूर्ति और उनके चमत्कार से इतने प्रभावित थे कि वे अपने परिवार को जिस पोस्टकार्ड पर पत्र लिखकर भेजते थे, उस पोस्टकार्ड के पीछे श्रीगोपाल मंदिर भवन का पोस्टकार्ड साइज फोटो रहता था। पोस्टकार्ड पर जिस जगह पत्र भेजने का पता रहता था, उसके पास आधी खाली जगह पर अपने प्रियजनों को संदेश लिखकर अंग्रेज इंग्लैंड और दुनिया भर के अन्य स्थानों पर पत्राचार करते थे। खास बात यह है कि गोपाल मंदिर के 3 ऐसे चित्र पोस्टकार्ड भी हैं। इसी से ऐसा पता चलता है कि गोपाल मंदिर की ख्याति उस समय कितनी फैली हुई थी। मंदिर में गोपालजी की जो प्रतिमा स्थापित है, वह भी कसौटी के पत्थर (ओब्सीडियन नामक एक सोने का परीक्षण पत्थर) से बनी हुई है। जो आज भी आकर्षण का केंद्र है।
महू का पहला स्कूल
सन 1900 की शुरुआत में गोपाल मंदिर की सबसे ऊपरी मंजिल पर एक स्कूल शुरू किया गया था। सदर बाजार महू के 1907 के सर्वे ऑफ इंडिया मैप में स्कूल का जिक्र है, जहां मंदिर था। महू में यह एकमात्र स्कूल था जो एक मंदिर के ऊपर लगता था। कुछ समय पर इस जगह को गोपाल मंदिर स्कूल कहा जाने लगा था। वर्तमान में यह स्कूल माहेश्वरी स्कूल के नाम से है।
वृंदावन से आई सन्यासी
महू निवासी और वर्तमान में पूणे में पदस्थ वैज्ञानिक विजय सांघी ने बताया कि करीब 60.65 वर्ष पहले अचानक एक दिन वृंदावन से जानी बाई नाम की एक संयासिन गोपाल मंदिर पहुंच गई। इसके बाद वर्षो तक गोपाल मंदिर में ही गोपालजी की सेवा करती रहीं। उनकी भक्ति ऐसी थी कि आरती करते समय गोपालजी की भक्ति में इतनी डूब जाती थी कि आरती की थाली ऊपर और नीचे घुमाई जाती थी, लेकिन कभी दीपक नहीं गिरता था। इस अदभुत दृश्य को देखने के लिए मंदिर मेें हर दिन बड़ी संख्या में लोग उमड़ते थे।
Published on:
03 Jun 2022 11:24 am
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