
'मेक इन इंडिया' नहीं बल्कि 'असेंबल इन इंडिया' बनता जा रहा पीएम मोदी का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट
नर्इ दिल्ली। साल 2014 में भारत में करीब 6.3 अरब डाॅलर कीमत के मोबाइल फोन चीन से आयात किए गए। इसके बाद लगातार तीन सालों में इस में कमी देखने को मिली। काॅमर्स एंड इंडस्ट्री मिनिस्ट्री की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2017 में ये आंकड़ा घटकर 3.3 अरब डाॅलर हो गया था। साल 2014 से 2017 के दौरान चीन से अायात होने वाले मोबाइल फोन पार्ट्स व टेलिकाॅम इक्वीपमेंट्स 1.3 अरब डाॅलर से बढ़कर 9.4 बिलियन डाॅलर हो गया।
घरेलू विनिर्माण क्षेत्र के लिए चुनौती
इस रिपोर्ट से पता चलता है पहले चीनी फोन को चीन में ही असेंबल किया जाता था लेकिन अब इसके पार्ट्स भारत में ही आयात कर असेंबल किया जाता है। इसका मतलब यह है कि देश में स्किल्ड फोक्सड प्रोडक्ट्स के आयात निर्भरता करने के लिए घरेलू विनिर्माण के चुनौती दे रहा है। यदि देश में विनिर्माण सुविधा स्थापित करने वाली कंपनी बल्क में आयात होने वाले इनपुट की मदद से प्रोडक्ट्स को केवल असेंबल ही कर सकेगी। क्योंकि निर्माण के लिए इस्तेमाल होने वाले कर्इ प्रोडक्ट्स का एक बड़ा हिस्सा अभी भी अायात ही किया जाता है।
असेंबल इन इंडिया से ही पूरा होगा लक्ष्य
इसी साल अप्रैल माह में इंडियन सेल्युलर एसोसिएशन ने टेलिकाॅम व आर्इटी मिनिस्ट्री को जानकारी दी थी कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरर बन गया है। साल 2014 के अंत में केंद्र सरकार ने 2019 तक देश में मेक इन इंडिया के तहत 50 लाख मोबाइल फोन निर्माण करने का लक्ष्य रखा था। जिसे नेशनल पाॅलिसी आॅन इलेक्ट्राॅनिक्स प्रस्ताव के तहत आर्इटी मिनिस्ट्री ने रिवाइज कर 2025 तक 1 अरब मोबाइल फोन मैन्युफैक्चर करने का लक्ष्य रखा है। लेकिन चिंता की बात ये है सरकार के इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए भारत में माेबाइल फोन की असेंबलिंग करके ही पूरा किया जा सकता है। एेसे में घरेलू बाजार में इसका कुछ खासा असर नहीं देखने काे मिलेगा। वहीं दूसरी तरफ रोजकाेषिय घाटे पर इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा।
Updated on:
17 Oct 2018 08:25 am
Published on:
16 Oct 2018 08:02 pm
