
मृत्यु के बाद आखिर कहां जाती है मनुष्य की आत्मा
जबलपुर। मानव जीवन से जुड़ा दुनिया का ऐसा कोई भी पहलू नहीं है, जिसका उल्लेख भारतीय वैदिक साहित्य में नहीं हो..। जन्म से लेकर मृत्यु तक के सोलह संस्कारों में व्यक्ति के अधिकार, कर्तव्य और नैतिक दायित्वों का बोध कराया गया है। मनीषियों के अनुसार सारे नियम मनुष्य के जीवन को सरल, सुगम, मर्यादित और सुखमय बनाने के लिए ही हैं। गरुण पुराण में तो जन्म से पहले और मृत्यु के बाद तक की गतिविधियों को प्रस्तुत किया गया है। इसमें यह तक बता दिया गया है कि मृत्यु के पश्चात आत्मा आखिर कहां जाती है। उसके साथ क्या-क्या होता है? उसे किन-किन परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है और इस परीक्षा में फेल या पास होने के बाद उसकी क्या गति होती है? आइए आपको भी इस रहस्य से अवगत कराते हैं।
शिथिल हो जाती हैं इंद्रियां
पुराणाचार्य पं. दिनेश शास्त्री के अनुसार गरुड़ पुराण में यह स्पष्ट लिखा है कि मृत्यु के बाद आत्मा का सफर कैसा होता है। पुराण में उल्लेख है कि जब मृत्यु निकट आती है तो मनुष्य की सभी इंद्रियां शिथिल हो जाती हैं। वह चाहकर भी कुछ बोल नहीं पाता। प्राण निकलते ही आत्मा एक दिव्य स्वरूप में परिवर्तित हो जाती है। उसे सारा जगत ब्रम्ह स्वरूप लगने लगता है। इंद्रियां शिथिल होने की वजह से उसके मुंह से झाग जैसा निकलने लगता है। अलग-अलग कर्म करने वाले व्यक्यिों के प्राण अलग-अलग इंद्रियों से निकलते हैं। इसी के हिसाब से उनके पाप और पुण्य का निर्धारण होता है।
अंगूठे के आकार की आत्मा
ज्योतिषाचार्य पं. जनार्दन शुक्ल के अनुसार गरुड़ पुराण में उल्लेख है कि मृत्यु के समय काल के दूत पाशदंड धारण किए हुए प्राणी के पास पहुंचते हैं। उनका स्वरूप इतना भयानक व क्रोधयुक्त होता है कि भय के कारण पापी मल-मूत्र तक कर देते हैं। मृत्यु के समय प्राणी की आत्मा "हा हा" स्वर बोलते हुए शरीर से निकलती है। आत्मा का आकार अंगूठे के बराबर रहता है। यमदूत पापात्माओं के गले में पाश बांधकर उसे यमलोक ले जाते हैं ।
पापात्माओं को भय
गरुण पुराण के अनुसार यमदूत यमलोक ले जाते समय रास्ते में पापात्माओं को भयभीत करते हैं। नर्क की यातनाओं के बारे में बताते हैं। ऐसी बातें सुनकर पापात्मा रुदन करने लगती है । इसके उपरांत पापात्मा को कुत्तों द्वारा काटा जाता है । इस समय दुखी पापात्मा अपने पापकर्मों को याद करते करता हुआ आगे बढ़ता है । इसके बाद उसे आग की लपटों से गुजरना पड़ता है । पापात्मा के भूख-प्यास से व्याकुल होने पर यमदूत उसकी पीठ पर चाबुक मारते हुए उसे आगे धकेलते हैं । पापात्मा कई बार गिरकर अचेत हो जाती है । परंतु यमदूत निरंतर पापात्मा को यतनाएं देते हुए अंधकारमय मार्ग से यमलोक की ओर ले जाते हैं ।
15 लाख किमी दूर है यमलोक
गरुण पुराण में उल्लेख है कि भूलोक से यमलोक की दूरी 99 हजार योजन यानी करीब 1584000 किलोमीटर है। पापात्मा के यमलोक पहुंचने पर तथा यमदूतों की यातना सहने के बाद यमराज उसके लिए सजा निर्धारित करते हैं। यमराज की आज्ञा के अनुसार बुरी आत्माओं को आकाश से ही गिराकर वापस उसके नगर या गांव के समीप छोड़ दिया जाता हैं। घर लौटकर पापात्मा छटपटाते हुए पुन: मृत शरीर में प्रवेश करने की चेष्टा करती है, लेकिन उसका प्रवेश कर पाना संभव नहीं हो पाता। वह भूख-प्यास से व्याकुल होकर छटपटाता और रुदन करता रहा है। परिजनों द्वारा अंत समय में किए हुए पिंडदान से भी पापात्मा की तृप्ति नहीं होती और भूख-प्यास तड़पते हुए वह फिर से यमलोक लौटती है ।
जब प्रेत बन जाती है आत्मा
पुराणाचार्य पं. रामसंकोची गौतम के अनुसार जो पुण्य आत्माएं होती हैं, उनके लिए ज्यादा लोकाचार की आवश्यकता नहीं पड़ती, लेकिन पापात्माओं को काफी कष्ट भोगने पड़ते हैं। पुराण में उल्लेख है कि यदि मृतक के पुत्र-पौत्रों द्वारा पापात्मा को पिंडदान नहीं दिया जाता तो वह प्रेत रूप धारण कर दीर्धकाल तक धरती पर ही भटकती रहती है । मृत्यु के उपरांत 10 दिनों तक पिंडदान अनिवार्य बताया गया है, इसके बाद मासिक, त्रैमासिक और वार्षिक पिंडदान भी होते हैं। बताया गया है कि मृत्यु के दसवें दिन तक किए गए पिंडदान के चार भाग होते हैं। पिंडदान के दो भाग मृत देह को प्राप्त होते हैं, तीसरा हिस्सा यमदूत को प्राप्त होता है तथा चौथा हिस्सा पापात्मा रूपी प्रेत का ग्रास बनता है। मृत शरीर के अंतिम संस्कार उपरांत पिंडदान से प्रेत को हाथ के बराबर शरीर प्राप्त होता है। यम मार्ग में यही प्रेत शुभाशुभ फल पाता है ।
पिंड से बनता है शरीर
पुराणाचार्य पं. अखिलेश त्रिपाठी के अनुसार गरुड़ पुराण में उल्लेख है कि प्रेत को पहले दिन के पिंडदान से सिर, दूसरे दिन से गर्दन व कंधे, तीसरे दिन के पिंडदान से हृदय, चौथे दिन के पिंडदान से पीठ, पांचवें दिन के पिंडदान से नाभि, छठे व सातवें दिन के पिंडदान से कमर व नीचे का भाग, आठवें दिन के पिंडदान से पैर, नवमे दिन के पिंडदान से प्रेत का शरीर प्राप्त होता है। दसवें दिन के पिंडदान से उस शरीर को चलने की शक्ति प्राप्त होती है तथा प्रेत की भूख-प्यास उत्पन्न होती है। पिंड शरीर धारण कर भूख-प्यास से व्याकुल प्रेतरूप में ग्यारहवें व बारहवें दिन का भोजन करता है। तेरहवें दिन यमदूत प्रेत को बंदर की तरह पकड़ लेते हैं। इसके बाद वह प्रेत भूख-प्यास से तड़पता हुआ अकेला यमलोक जाता है । वैतरणी नदी से यमलोक के 86 हजार योजन के सफर पर प्रेत प्रतिदिन 200 योजन चलता हुआ 47वें दिन यमलोक पहुंचता है। यम मार्ग में सोलह पुरियों को पार करके प्रेत यमलोक पहुंचता है। पापात्माएं यमपाश में बंधी होने के कारण मार्ग में हाहाकार करते हुए रोती बिलखती हुईं यमलोक पहुंचकर अपने कर्मानुसार फल भोगती हैं।
ये पाप पहुंचाते हैं नरक
त्रिमूर्ति नगर निवासी भागवताचार्य पं. जगदम्बा प्रसाद मिश्र के अनुसार ब्राह्मण या पुजारी को मारना, किसी को नशे की हालत में छोडकऱ चले जाना, किसी पवित्र संकल्प और वादों को तोडऩा, भ्रूण की हत्या करना या फिर भ्रूण को नष्ट करना, किसी को सताना, पर स्त्री गमन, निर्दोष व्यक्ति व पशु-पक्षी की हत्या, पंच देवों का अनादर, ब्राम्हणों का अपमान, माता-पिता, पत्नी को कष्ट देना आदि को गरुड़ पुराण में बहुत बड़ा पाप माना जाता है। अगर कोई इंसान ऐसा करता है, तो निश्चित तौर पर उसे नरक में सज़ा पाने के लिए तैयार रहना चाहिए। किसी महिला की हत्या करना, महिला को प्रताडि़त करना, मूकदर्शक की तरह आंखों के सामने किसी की इज्जत लुटते देखते रहना, या फिर किसी गर्भवती महिला को मारना-पीटना आदि भी आदमी को नरक गामी बनाते हैं। किसी के विश्वास को धोखा देना और किसी की हत्या करने के लिए हथियार के रूप में ज़हर का इस्तेमाल करना भी घोर पाप है और इसका रास्ता भी सीधे नरक की ओर जाता है। पापात्माओं को नरक में अलग-अलग यातनाएं दी जाती हैं। कई वर्षों तक वे वहां ऐसी ही पड़ी, तड़पती रहती हैं।
Published on:
04 May 2018 09:27 pm
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