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Jabalpur कारतूस से लेकर बोफोर्स और शक्तिशाली बम बनने की कहानी

- अंग्रेजों के जमाने के रक्षा उत्पादन कारखाने देश को दुनिया में दे रहे ताकत- अंग्रेजों ने की थी जीसीएफ और ओएफके की स्थापना जबलपुरदेश के सबसे बड़े रक्षा उत्पादन कारखाने का केंद्र जबलपुर के बनने की कहानी दिलचस्प है। अंग्रेजों के जमाने के यह कारखाने वर्तमान में सेना की ताकत की रीढ़ हैं। कभी कारतूस बनाने से शुरू हुए जबलपुर के ओएफके व जीसीएफ का सफर अत्याधुनिक हथियारों को विकसित करने का केंद्र बन चुका है।

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अंग्रेजों ने की थी जीसीएफ और ओएफके की स्थापना

Jablpur OFK


रक्षा उत्पादन क्षेत्र में जबलपुर शुरू से अंग्रेजों के भरोसेमंद शहरों में शामिल रहा। आजादी की लड़ाई और जलवायु की दृ ष्टि से उन्हें यह क्षेत्र सुर क्षित लगता था। इसलिए 1904 में जहां गन कैरिज फैक्ट्री तो 1942 में दूसरी अहम फैक्ट्री आयुध निर्माणी खमरिया की स्थापना अंग्रेजों ने की। छोटे उत्पादों से इनकी शुरूआत हुई। आज यह सभी आधुनिकता के रंग में रंगी हैं। इनमें तीनों सेनाओं के लिए विध्वंसक और आधुनिक हथियारों के अलावा और गोला-बारूद का उत्पादन किया जा रहा है। हर बड़े युद्ध में इनके रक्षा उत्पादों का इस्तेमाल हुआ है।


प्रथम विश्व युद्ध से पहले अंग्रेजों में रक्षा प्रतिष्ठानों को लेकर भय पैदा हो गया था। इसलिए मद्रास(अब चेन्नई) से लेकर उत्तरप्रदेश और महाराष्ट्र तक फैले छोटे कारखानों को एक जगह लगाने का विचार आया। उन्हें क्रांतिकारियों को लेकर डर ज्यादा था। लिहाजा उन्होंने पहले से ही छावनी बने जबलपुर का चुनाव किया। गन कैरिज फैक्ट्री स्थापना 1901-02 में प्रारंभ हो गई। तब और अब की फैक्ट्री में बड़ा अंतर आ गया है। अब यहां देश की सबसे बड़ी धनुष तोप बन रही है।

सेना को यहीं से है ताकत
स्थापना की शुरूआत में इस फैक्ट्री में 18 पाउंडर, 25 पाउंडर गन कैरिज और 3.7 हॉवित्जर हुई कार्ट तथा कैरिज (गाड़ी) का ही निर्माण किया जाता था। द्वितीय विश्वयुद्ध में इसकी क्षमताओं को बढ़ाया गया। स्वतंत्रता के बाद निर्माणी ने रक्षा क्षेत्र में उत्तरोत्तर प्रगति की। यहां शक्तिमान और एक टन क्षमता का निशान ट्रक एवं जोंगा जीप बनी। फैक्ट्री ने 51 एमएम, 81 एमएम, 120 एमएम मोर्टार तैयार किया है। 130 एमएम तोप की अपगरिंग कर 155 एमएम कैलीबर में तब्दील किया। नेवी के लिए कवच नाम का रॉकेट लांचर, टी-90 युद्धक टैंक के लिए गन, लाइट फील्ड गन और सबसे बड़ी उपलिब्ध स्वीडन की बोफोर्स का स्वदेशीकरण कर धनुष के रूप में उत्पादन करना है। यह तोप 40 किमी की दूरी तक गोला दाग सकती है।

बनते हैं ताकतवर बम
अंग्रेजों ने जलवायु के हिसाब से आयुध निर्माणी खमरिया की स्थापना की थी। शुरूआत में यहां पर 3 नॉट 3 कारतूस बनते थे, जिनका इस्तेमाल अंग्रेजी सेना करती थी। वहीं 7.62 जैसे कारतूस भी बनते थे। लेकिन समय के साथ मीडियम और हाई रेंज के हथियार तैयार किए जाने लगे। आज की यहां तीनों सेना के लिए ताकतवर बमों का उत्पादन किया जा रहा है। इसमें 155 एमएम का गोला, 125 टैंक एमुनेशन, एरियल बम, थाउजेंड पाउंडर बम आदि शामिल हैं।