
Ganesh Chaturthi, Mangala Gauri Vrat Puja 31 July 2018
जबलपुर। श्रावण माह के प्रत्येक मंगलवार को मंगला गौरी व्रत किया जाता है। यह व्रत सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए अखंड सौभाग्य का वरदान होता है। देवी गौरी का यह व्रत मंगला गौरी के नाम से विख्यात है, जिस प्रकार माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने हेतु कठोर तप किया उसी प्रकार स्त्रियां इस व्रत को करके अपने पति की लम्बी आयु का आशीर्वाद प्राप्त करती हैं।
प्रेमी से मिलन
इस व्रत का महत्व इसलिए भी है कि इसके पुण्य से प्रेमी-प्रेमिका का मिलन होता है। कुंवारी कन्याएं माता पार्वती का पूजन कर पूर्ण श्रद्धा से यह व्रत करें तो उन्हें अपने प्रेमी से विवाह करने में कोई नहीं रोक सकता। मंगला गौरी व्रत के प्रभाव से उनकी शादी अपने प्रेमी के साथ ही होती है।
मंगला गौरी कथा- मंगला गौरी व्रत के साथ एक कथा का संबंध भी बताया जाता है, जिसके अनुसार प्राचीन काल में एक नगर में धर्मपाल नाम का एक सेठ अपनी पत्नी के साथ सुख पूर्वक जीवन-यापन कर रहा होता है। उसके जीवन में उसे धन-वैभव की कोई कमी न थी किंतु उसे केवल एक ही बात सताती थी कि उसके कोई संतान नहीं थी, जिसके लिए वह खूब पूजा-पाठ और दान-पुण्य भी किया करता था। उसके इस अच्छे कार्यों से प्रसन्न हो भगवान की कृपा से उसे एक पुत्र प्राप्त हुआ लेकिन पुत्र की आयु अधिक नहीं थी। ज्योतिषियों के अनुसार उसका पुत्र सोलहवें वर्ष में सांप के डसने से मृत्यु का ग्रास बन जाएगा।
अपने पुत्र की कम आयु जानकर उसके पिता को बहुत ठेस पहुंची लेकिन भाग्य को कौन बदल सकता है, अत: उस सेठ ने सब कुछ भगवान के भरोसे छोड़ दिया और कुछ समय पश्चात अपने पुत्र का विवाह एक योग्य संस्कारी कन्या से कर दिया। सौभाग्य से उस कन्या की माता सदैव मंगला गौरी के व्रत का पूजन किया करती थी। अत: इस व्रत के प्रभाव से उत्पन्न कन्या को अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद प्राप्त था, जिसके परिणाम स्वरुप सेठ के पुत्र की दीर्घायु प्राप्त हुई ।
मंगलागौरी पूजन विधि - व्रत का आरंभ करने वाली महिलाओं को श्रावण मास के प्रथम मंगलवार के दिन इन व्रतों का संकल्प सहित प्रारम्भ करना चाहिए। श्रावण मास के प्रथम मंगलवार की सुबह, स्नान आदि से निर्वत होने के बाद, मंगला गौरी की मूर्ति या फोटो को लाल रंग के कपड़े से लपेट कर, लकड़ी की चौकी पर रखा जाता है। इसके बाद गेहंू के आटे से एक दीया बनाया जाता है, इस दीये में 16-16 तार की चार बत्तियां कपड़े की बनाकर रखी जाती है। सबसे पहले श्रीगणेशजी को पूजन में जल, रोली, मोली, चन्दन, सिन्दूर, सुपारी, लौंग, पान, चावल, फूल, इलायची, बेलपत्र, फल, मेवा और दक्षिणा चढ़ाते हंै।
इसके पश्चात् कलश का पूजन भी श्रीगणेशजी की पूजा के समान ही किया जाता है। चढ़ाई गई सभी सामग्री ब्राह्मण को दे दी जाती है। मंगला गौरी की प्रतिमा को जल, दूध, दही से स्नान करा, वस्त्र आदि पहनाकर रोली, चन्दन, सिन्दूर, मेहंदी व काजल लगाते हंै। शृंगार की सोलह वस्तुओं से माता को सजाया जाता है। अंत में मंगला गौरी व्रत की कथा सुनी जाती है। कथा सुनने के बाद विवाहित महिला अपनी सास तथा ननद को सोलह लड्डू देती है। अंतिम व्रत के दूसरे दिन बुधवार को देवी मंगला गौरी की प्रतिमा को नदी या पोखर में विर्सजित कर दिया जाता है। इस व्रत को लगातार पांच वर्षों तक किया जाता है। इसके पश्चात व्रत का उद्यापन कर देना चाहिए।
Published on:
31 Jul 2018 08:53 am
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