
grah nakshatra of pure water, Nakshatras, Padas and the Stars
जबलपुर। ‘वर्षा ऋतु में बारिश होती है। प्रतिदिन हो यह नियम नहीं है। लेकिन, वर्षा तो उसे ही कहा जाता है, जो आद्र्रता का वातावरण बनाए रखे। गर्मी हो भी जाए तो शाम तक बारिश अवश्य होती है। रात तक तापमान गिर जाता है। बारिश का पानी साफ-सुथरा रहता है, लेकिन वातावरण को पाकर वह पानी अनेक प्रकार के दूषण से युक्त होकर बहकर अंतत: नदियों के जरिए समुद्र में मिल जाता है। चार माह वर्षा होती है। उसमें एक अगस्त नक्षत्र का उदय होता है। उसकी अपनी विशेषता होती है। वह भी एक काल है। यह अन्य नक्षत्रों से भिन्न होता है, क्योंकि उसमें बहने वाला पानी पूर्णत: शुद्ध-स्तब्ध रहता है। सिंधु-गंगा और ब्रह्मपुत्र वही है।’ ये उद्गार आचार्य विद्यासागर ने दयोदय तीर्थ तिलवाराघाट में शनिवार को मंगल प्रवचन में व्यक्त किए।
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दयोदय तीर्थ ग्वारीघाट में आचार्य विद्यासागर के मंगल प्रवचन
‘शुद्धता का प्रतीक है अगस्त नक्षत्र का पानी’
आचार्यश्री ने कहा, अगस्त नक्षत्र के जीवन की तरह हमें जीवन में शुद्धता का समावेश करना चाहिए। अज्ञान के कारण किए जाने वाले संग्रह का भाव अशुद्धता है। जबकि, दान का भाव शुद्धता का प्रतीक है, जो अनेक प्रकार की व्याधियों को दूर करने का कारण बनता है। पाप को भी कुछ अंश में साफ करना प्रारंभ करता है। चांदी और सोने को साफ करने के लिए विशेष द्रव्य का उपयोग किया जाता है। रीठे के द्वारा सोने-चांदी को जैसे चमकाया जाता है, वैसा ही जीवन में भी होना चाहिए। अगस्त नक्षत्र को अपने जीवन में उतारना ही शुभ भाव माना जाता है। यह धर्म की भूमिका में सहज रूप से घटित होना शुरू होता है।
दान से सार्थक होता है जीवन-
आचार्यश्री ने आगे कहा, दानदाता होना सबसे बड़ी बात है। इससे जीवन सार्थक होता है। धर्म की यही प्रेरणा है। इससे परिवार का उत्थान होता है। संतानों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। हमने कभी दान का अपने लिए कोई उपयोग नहीं किया, पर लोग देते जाते हैं और धर्म में सब लगता चला जाता है।
Published on:
28 Apr 2019 01:02 pm
