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हलषष्ठी व्रत कथा व पूजा विधि, जानें महत्व दीर्घायु होगा पुत्र – देखें video
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हलषष्ठी व्रत कथा व पूजा विधि, जानें महत्व दीर्घायु होगा पुत्र – देखें video

धर्म शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान शेषनाग द्वापर युग में भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम के रूप में अवतरित हुए थे

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Lalit Kumar Kosta

Aug 10, 2017

जबलपुर। भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी को हलषष्ठी पर्व मनाया जाता है। यह पर्व भगवान श्री कृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता श्रीबलराम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान शेषनाग द्वापर युग में भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम के रूप में अवतरित हुए थे। बलराम जी का प्रधान शस्त्र हल व मूसल है। इसी कारण इन्हे हलधर भी कहा गया है। उन्हीं के नाम पर इस पर्व का नाम हलषष्ठी पड़ा। इसे हरछठ भी कहा जाता है। श्री बलरामजी का प्रधान शस्त्र हल तथा मूसल है। इसी कारण उन्हें हलधर भी कहा जाता है। उन्हीं के नाम पर इस पर्व का नाम ‘हलषष्ठी या हरछठ’ पड़ा। भारत के कुछ पूर्वी हिस्सों में इसे ‘ललई छठ’ भी कहा जाता है।

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हल को कृषि प्रधान भारत का प्राण तत्व माना गया है और कृषि से ही मानव जाति का कल्याण है। इसलिए इस दिन बिना हल चले धरती का अन्न व शाक भाजी खाने का विशेष महत्व है। इस दिन गाय का दूध व दही का सेवन वर्जित माना गया है। इस दिन व्रत करने का विधान भी है। हलषष्ठी व्रत पूजन के अंत में हलषष्ठी व्रत की छ: कथाओं को सुनकर आरती आदि से पूजन की प्रक्रियाओं को पूरा किया जाता है। भगवान शिव पार्वती, श्रीगणेश, कार्तिकेय, नंदी, सिंह और नाव आदि की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। इस प्रकार विधिपूर्वक हलषष्ठी व्रत का पूजन करने से जिनको संतान नहीं है। उनको दीर्घायु और श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति होती है । इस व्रत एवं पूजन से संतान की आयु आरोग्य एवं ऐश्वर्य में वृद्घि होती है।

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पूजा का विशेष महत्व
प्रतिवर्ष भाद्रपद माह की छठी तिथि को महिलाएं अपने पुत्र के दीर्घायु होने और उन्हें असामयिक मौत से बचाने के लिए हरछठ या हलषष्ठी व्रत करती हैं। इस दिन महिलाएं ऐसे खेत में पैर नहीं रखतीं, जहां फसल पैदा होनी हो और ना ही पारणा करते समय अनाज व दूध-दही खाती है। इस दिन हल पूजा का विशेष महत्व है।
– इस दिन गाय के दूध व दही का सेवन करना वर्जित माना गया है।
– इस दिन हल जुता हुआ अन्न तथा फल खाने का विशेष माहात्म्य है।
– इस दिन महुए की दातुन करना चाहिए।
– यह व्रत पुत्रवती स्त्रियों को विशेष तौर पर करना चाहिए।
– हरछठ के दिन दिनभर निर्जला व्रत रखने के बाद शाम को पसही के चावल या महुए का लाटा बनाकर पारणा करने की मान्यता है।

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अंत में निम्न मंत्र से प्रार्थना करें –
गंगाद्वारे कुशावर्ते विल्वके नीलेपर्वते।
स्नात्वा कनखले देवि हरं लब्धवती पतिम्‌ ।
ललिते सुभगे देवि-सुखसौभाग्य दायिनि।
अनन्तं देहि सौभाग्यं मह्यं, तुभ्यं नमो नमः।

– अर्थात् हे देवी! आपने गंगा द्वार, कुशावर्त, विल्वक, नील पर्वत और कनखल तीर्थ में स्नान करके भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त किया है। सुख और सौभाग्य देने वाली ललिता देवी आपको बारम्बार नमस्कार है, आप मुझे अचल सुहाग दीजिए।