
Chaturmas 2026: गणाचार्य पुष्पवंतसागर से जानिए जैन धर्म में चातुर्मास का महत्व (फोटो सोर्स- Chatgpt)
Ahimsa Dashlakshan: जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ से प्रारंभ हुए चातुर्मास (Chaturmas 2026) पर्व का अनुसरण आज भी प्रत्येक साधु-संतू करते हैं। पूर्णतः अहिंसा पर आधारित जैन धर्म धार्मिक भावनाओं से भरा हुआ धर्म है। प्रतिवर्ष वर्षा योग में जैन साधु-साध्वी एक ही स्थान पर रहकर धर्म की गंगा बहाने, धर्म का पालन व श्रावक श्राविकाओं को प्रवृत्ति से निवृत्ति की ओर ले जाने हेतु चातुर्मास किया जाता है। इसलिए मेरै चिंतन से चातुर्मास धर्म ध्यान का सीजन है जिसमें सत व आवक दोनों अधिक से अधिक धर्म ध्यान का अवसर प्राप्त करते हैं।
गणाचार्य पुष्पवंतसागर महाराज बताते हैं कि साधु-साध्वियों एवं श्रावक-श्राविकाओं के लिए आत्म साधना का प्रतिबिम्ब होता है चातुर्मास। यह साधु-साध्वियों सहित सभी को अहिंसा का पालन करने तथा मन, वचन एवं कार्य के निग्रह हेतु चातुर्मास किया जाता है। जिन धर्म का मूल स्त्रोत अहिसा है। अहिंसा का अर्थ जहां तक हो सके अपनी क्रियाओं द्वारा किसी की भी हिंसा न हों क्योंकि वर्षा काल में असंख्या जीवों की उत्पत्ति होती है इसलिए अहिंसा का विशेष तौर पर ध्यान दिया जाता है। जब आप विचरण करेंगें तो जीवों की हिंसा होगी।
इसलिए साधू संत एक ही स्थान पर 4 माह रह कर जिनवाणी के सिद्धांतों एवं जैन धर्म की वाणी का प्रचार-प्रसार करते हैं। भारत में विभिन्न धर्मों के संतों की अपनी-अपनी मान्यताओं और धार्मिक पद्धतिया है। इनमें चातुर्मास की परंपरा बड़ी महत्वपूर्ण है, जैन धर्म में इसका मूहत्वपूर्ण स्थान है। चातुर्मास का अर्थ है चार मास के लिए साधु-साध्वियों का एक स्थान पर ठहरना। चातुर्मास का आरंभ वर्षों ऋतु में होता है। वर्षा के कारण सभी मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं और जीव-जंतुओं की उत्पत्ति भी बढ़ जाती है अतः जीवों की रक्षा और संयम साधना के लिए चार मास तक साधु-साध्वियों को एक स्थान पर रुकने का शास्त्रीय विधान है। अपवाद स्वरूप ही साधु चातुर्मास में अन्यत्र जा सकते हैं।
शास्त्रों में उल्लेख है कि संघ पर संकट जाने अथवा किसी स्थविर या वृद्ध साधु की सेवा के लिए साधु चातुर्मास में दूसरे स्थान पर जा सकता है अन्याया में उसे चातुर्मास में एक स्थान पर रुकने का शास्त्रीय आदेश है। जैन साधु वर्ष में 8 माह नंगे पांत और दिन में एक बार आहार लेकर विहार कर जैन सिद्धान्तों, अहिंसा, सत्य ब्रह्माचार्य, सत्य ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह का विशेष प्रवचन श्रावकों को देते हैं। जैन धर्म में चातुर्मास की परंपरा प्राचीन है। स्वयं भगवान महावीर ने जीवन में विभिन्न क्षेत्रों में चातुर्मास किए। उन्होंने अपना अंतिम 42वों चातुर्मास पावापुरीमें किया था। यहां उन्होंने अपना अंतिम उपदेश तथा देशनाएं दी थीं।
यहां महावीर ने अपने शिष्य गौतम स्वामी को प्रतिबोध देते हुए कहा था- समर्थ गौयम मा पमा अर्थात हे गौतमा संयम संयम साधना के लिए एक क्षण भी आलस्य मत करो। महावीर का यह संदेश केवल गौतम स्वामी के लिए ही नहीं अपितु प्रत्येक साधक के लिए था। जैन धर्म में सामाजिक तथा धार्मिक दृष्टि से यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। व्यक्ति और समाज परपस्पर संबद्ध हैं। हमारे साधु-में साध्वियां वर्षावास में लोगों को समाज में परस्पर भाईचारे, सद्भावना और आत्मीयता बनाए रखने की प्रेरणा देते हैं। आधुनिक युग संदर्भ में व्यक्ति और समाज की परिस्थितियां बदल गई हैं। साधु-साध्वी मर्यादित जीवन जीने की प्रेरणा प्रेरणा देते हैं। धार्मिक दृष्टि से तप, जप, स्वाध्याय, दान, उपकार और सेवा आदि प्रवृत्तियों को प्रश्रय देना उनका ध्येय भी है और कर्तव्य भी, क्योंकि साधु-साध्वियां समाज के अधिक निकट होते हैं और वे समाज में पनप रही रूढ़ियों और मिथ्या धारणाओं का निराकरण करने का प्रयत्न करते हैं। आधुनिक युग संदर्भ में चातुर्मास की यही विशेषता है।
चातुर्मास में दशलक्षण महापर्व भी आता है। एक ओर जहां यह तप त्याग का पर्व है वहां परस्पर वैमनस्य और वैर, विरोध को दूर करने का सशक्त माध्यम भी है। भगवान महावीर ने चातुर्मास में इसकी गवेषणा इसलिए की थी कि व्यक्ति समाज में रहते अनेक प्रकार के मन मुटावों का शिकार हो सकता है अतः महापर्व में क्षमा धर्म से इनका सुधार कर लिया जाए। यह धारणा एक स्वस्थ और सभ्य समाज की गारंटी इस प्रकार जैन धर्म में चातुर्मास है। का सामाजिक और धार्मिक महत्व तो है ही व्यक्ति और समाज को एक सूत्र में पिरोने का भागीरथ प्रयत्न भी है।
Updated on:
28 Jul 2026 10:34 am
Published on:
28 Jul 2026 10:34 am
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