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होली पर शहर में बिक रही ये खतरनाक गुलाल, उपयोग करते हुए जल जाएगा चेहरा

लेबर की कमी से मशीन ठप, मैनुअल हो रहा कार्य, रंग की जगह मिलाया जाता है रसायन

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जबलपुर। औद्योगिक क्षेत्र रिछाई में बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों के बीच में एक छोटी यूनिट गुलाल निर्माण की है। इस फैक्ट्री में गुलाल के अलावा सिंदूर भी बनाया जाता है। होली के त्योहार को देखते हुए यहां गुलाल बनाने का काम तेजी पर है। इसे बनाने में मार्बल स्टोन पाउडर के साथ रंग मिलाया जाता है। इस पाउडर में विभिन्न प्रकार के रंग मिलाकर विभिन्न रंगों के गुलाल तैयार किए जा रहे हैं। फैक्ट्री की गतिविधियां वीडियों में रिकार्ड की गई है। जानकारों की मानें तो ये गुलाल चेहरे की स्किन जला भी सकती है, ये असर तत्काल भी हो सकता है। या फिर कुछ दिनों बाद इसके साइड इफेक्ट सामने आ सकते हैं।

एेसे होता है कार्य
मार्बल स्टोन पाउडर को ग्राइंडिंग मशीन में डाला जाता है। इस मशीन में रसायन युक्त रंग मिलाया जाता है। रंग और पाउडर के मिश्रित होने के बाद इसे छान लिया जाता है। पाउडर छनने के बाद इसे बोरियों में भरकर बाजार में भेज दिया जाता है।

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ये है परेशानी
मिश्रण को छानने या फिर उसे बोरियों में भरने के दौरान धूल उड़ती है। यह सांसों के जरिए शरीर और फेफड़ों में चली जाती है। इस कार्य के दौरान मजदूरों को किसी प्रकार का सुरक्षा मास्क नहीं दिया जाता है।

प्राकृतिक या सुरक्षित रंगों का इस्तेमाल नहीं
गुलाल निर्माण की इस यूनिट में प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल नहीं किया जाता, बल्कि प्राकृतिक रंगों की जगह विभिन्न रसायन इस्तेमाल किए जाते हैं। ये दिल्ली से मंगाए जाते हैं। इनका स्वभाव क्षारीय होता है, जिससे त्वचा व आंखों पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है।

ये हैं कैमिकल से बने रंग
बैंगनी- टाइटेनियम
नीला- वेनिडियल, क्रोमियम
पीला- वैनाडेट
नारंगी- डायक्रोमेट
हरा- कॉपर
गुलाबी- कोबाल्ट
लाल- मैंग्नीज

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ये हैं प्राकृतिक रंग
नारंगी- टेसू (पलाश) के फूल, हरसिंगार के फूल, चंदन आदि से नारंगी रंग बनाया जाता है।
लाल- जसवंती के फूल, बुरांस के फूल, अनार के छिलकों से लाल रंग बनाता है। पलिता, मदार और पांग्री के फूल से भी लाल रंग बना जाता है।
हरा- गुलमोहर की पत्तियां और सूखा मेहंदी पावडर हरे रंग की तरह इस्तेमाल होता है।
गुलाबी- चुकन्दर से गुलाबी रंग तैयार होता है।
पीला- अमलतास, गेंदा व पीले सेवंती के फूल से पीला रंग बनाया जाता है।
नीला- जामुन, जकरन्दा के फूलों की पंखुडिय़ों से नीला रंग बनता है।

एक्सपर्ट ओपेनियन
रसायनशास्त्री एचबी पालन के मुताबिक रंगों का आधार एल्काइन होता है। इन रंगों की गर्म तथा ठंडे पानी में अलग-अलग रासायनिक क्रिया होती है, जिससे ये बुरा प्रभाव भी छोड़ सकते हैं। रसायनिक रंगों का तेलीय या पाउडर मिश्रण अलग प्रभाव छोड़ता है। विक्टोरिया अस्पताल के एमडी डॉ. संदीप भगत के मुताबिक रंगों की वजह से त्वचा और आंखों कई मामले सामने आए हैं। मरीजों के बाजार में मिलने वाले सूखे रंगों की वजह से त्वचा में संक्रमण हुआ था। रंगों के कैमिकल असर सबसे ज्यादा त्वचा पर पड़ते हैं। इसके साथ आंख तथा कानों में भी इसका प्रभाव देखा गया है।

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फैक्ट्री सुपरवाइजर से बातचीत
- यहां काम के दौरान श्रमिकों को मास्क नहीं दिया जाता है?
उससे क्या होता है।
- अरे ये जो धूल उड़ रही है, उससे बचाव होता है?
यहां तो आदत बन चुकी है। कोई जरूरत नहीं पड़ती है। होली में ही ज्यादा काम होता है, उसके बाद तो कोई पूछता नहीं है।
- तो इससे बीमारी नहीं होती है क्या?
यह मुझे क्या मालूम।